प्रश्नकर्ता: क्या अहंकार भी सात्विक, राजसिक, तामसिक होता है? कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: होता है। अहम् के साथ भी तुम इन तीनों गुणों को जोड़कर देख सकते हो। प्रकृति के गुण हैं, अहम् पर ही लागू होते हैं।
तामसिक अहंकार क्या है?
जिसने धारणा बना ली है कि, "मैं जहाँ हूँ, जैसा हूँ, ठीक हूँ, पूर्ण हूँ, स्वस्थ हूँ", उससे तुम पूछो, “क्या हालचाल?”
“बहुत बढ़िया, हमसे बढ़िया कौन हो सकता है!”
तामसिक अहंकार वो जिसे छटपटाहट अनुभव होनी बहुत कम हो गई है। कैसे कम हो गई है? वैसे कम हो गई है जैसे एक बेहोश आदमी को छटपटाहट नहीं महसूस होती। जैसे एक आदमी जिसे दर्द बहुत हो रहा हो और उसे तुम नींद का इंजेक्शन दे देते हो, उसकी छटपटाहट कम हो जाती है, तमसा ऐसी ही है। बेहोशी के काले अँधेरे को कहते हैं 'तमसा'। चेतनाहीनता के तिमिर का नाम है 'तमसा'।
तमसा का उपयोग है अहंकार के लिए। क्या उपयोग है?
अँधेरी रात है, और हमारी आँखों में नशा है, बेहोशी है, नींद है, हमें कुछ दिखाई देगा ही नहीं। जब कुछ दिखाई देगा ही नहीं तो हमें ये कौन जताएगा कि हम नर्क में हैं? तमसा में सुविधा हो जाती है ख़ुद को ये प्रवंचना दिए रहने में कि सब ठीक चल रहा है।


