उपाधिविलयाद्विष्णो निर्विशेषं विशेन्मुनि:। जले जलं वियद्वव्योम्नि तेजस्तेजसि वा यथा।।
उपाधियों के नष्ट हो जाने पर मुनि सर्वव्यापक सत्ता अर्थात् विष्णु में, जल में जल, आकाश में आकाश और तेज में तेज की भाँति विलीन हो जाता है।
—आत्मबोध, श्लोक ५३
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, डाइनैमिक मेडिटेशन नियमित हो रहा था, जो अब छूट गया है, उसके बाद विपश्यना करने लगा नियमित, वो भी एक समय के बाद छूट गया। लम्बी दूरी तक चलना शुरू किया है। जब चलता हूँ, तभी साक्षी हो पाता हूँ, तब कोई स्लेफ़ टॉक या विचार नहीं होते, ऐसे लगता है कि शरीर ही चल रहा है या पैर ही चला रहे हैं। मैं पेशे से मैकेनिक हूँ। जब स्क्रू कस रहा होता हूँ तो ऐसा प्रतीत होता है कि स्क्रूड्राइवर ही काम कर रहा है। ऐसा ही खाना खाते समय, नहाते समय इत्यादि यांत्रिक कार्यों में अब होता है।
श्लोक में जब उपाधियों के नष्ट होने की बात कही जा रही है, तो क्या उसी स्थिति की बात की जा रही है जो अभी मेरी है? अगर है, तो क्या इसी तरह ध्यान को चौबीस घण्टों में फैलाना है? कृपा करके समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: जल में जल का मिलना, आकाश में आकाश का मिलना, तेज में तेज का मिलना प्रतीक हैं, सूचक हैं। वास्तव में किसमें किसके मिलने की बात हो रही है? वास्तव में बात हो रही है अहम् के आत्मा में मिलने की; वास्तव में बात हो रही है झूठ के सत्य में विलीन हो जाने की।


