प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं अभी जॉब कर रहा हूँ और घर वालों के हिसाब से, समाज के हिसाब से नौकरी की जो स्थिति है, वो ठीक है, पैसे ठीक-ठाक मिल रहे हैं। पर मुझे संतुष्टि नहीं मिल रही उससे। संतुष्टि काम के मामले में नहीं क्योंकि मैनें देखा है कि कॉर्पोरेट में जो काम होता है वैसा ही होता है, उसमें नौ घंटे लग जाते हैं। उसके बाद न खुद को जानने का समय मिलता है और ऊपर से थकावट जो होती है उसको मिटाने के लिए गलत-शलत तरीके अपनाता हूँ। नशे या फिर जो कि मीडिया कंटेंट है वो, उसका उपभोग करके अपनी थकावट मिटाने की कोशिश करता हूँ। जॉब मैं अपने लिए नहीं कर रहा हूँ, मेरी ज़रूरतें खुद ही कम हैं लेकिन मैं यह चीज़ घर वालों के लिए कर रहा हूँ, क्योंकि घरवालों की आर्थिक निर्भरता मेरे ऊपर है। तो अभी मैं यहाँ पर मुक्ति की तरफ कैसे जा सकता हूँ? मुझे लगता है कि मैं गलत तरीके से कमा रहा हूँ लेकिन अगर मैं ऐसा है कि मैं काम से भागने की कोशिश कर रहा हूँ तो बुद्ध जी ने भी कहा है कि दु:ख तो है; धरती पर आए हो तो वो तो रहेगी तो ये पूरी चीज़ जो है मुझे समझ में नहीं आ रही है। कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: बुद्ध ने इतना ही थोड़े ही कहा है कि जीवन दु:ख है, उन्होंने ये भी तो कहा है कि दु:ख से मुक्ति संभव है। दु:ख से मुक्ति संभव तब होगी जब तुम सही दृष्टि, सही विचार, सही कर्म, जीवन यापन का सही स्रोत रखोगे। अगर तुमको वास्तव में ऐसा लगता है कि घर वालों की आर्थिक ज़रूरतों के लिए तुम्हें इस नौकरी की ज़रूरत है ही तो दो दिशाओं से अपनी मुक्ति का प्रयत्न करो।
पहली बात तो ये कि ये देखो कि तुम जो कमा रहे हो वो वास्तव में घरवालों की आर्थिक सहायता के लिए कितना आवश्यक है। कहीं ऐसा तो नहीं कि घरवालों की ज़रूरतों के नाम पर तुम घर वालों की फ़रमाइशें पूरी कर रहे हो। बुनियादी माँग में और विलासिता में अंतर होता है न? माँगने को तो कोई तुमसे कुछ भी और कितना भी माँग सकता है, कि, "आप हमें इतना कमा कर दीजिए क्योंकि हमारी मासिक ज़रूरतें हैं, इतनी तो हैं ही।" तो ज़रा करीब जाकर तुमको देखना पड़ेगा कि क्या वास्तव में मासिक ज़रूरतें उतनी हैं भी या विलासिता की आदत डाल रहे हो तुम कुछ लोगों में।
दूसरी बात, अभी तो तुमने कह दिया कि तुम नौकरी सिर्फ इसलिए कर रहे हो क्योंकि घरवालों की जरूरतें पूरी करनी है। पर क्या वास्तव में ऐसा है? ईमानदारी से निरीक्षण करो तुम्हारी आय कितने प्रतिशत घरवालों की ज़रूरतें पूरी करने में जा रही है और कितनी आय तुम खर्च कर रहे हो अपनी ओर से अनाप-शनाप जगहों पर।


