प्रश्न: सर हम बचपन से सुनते आ रहे हैं कि जीव हत्या करना पाप है, पर फिर भी जीवों की हत्या होती रहती है। कभी धर्म के नाम पर, कभी खाने के नाम पर। ऐसा क्यों होता है सर?
वक्ता: ये तुम दूसरों की बात कर रहे हो या अपनी?
श्रोता १: सर अपनी ही नहीं, सबकी बात कर रहे हैं। सबको सिखाया जाता है कि जीवहत्या पाप है, पर जीवहत्या तो फिर भी होती ही है।
वक्ता: तुम करते हो?
श्रोता: नहीं सर हम नहीं करते।
वक्ता: ठीक है, जो करते हैं गलत करते हैं, पर तुम मत करना। तुम समझो बात को। तुम मत करना। दुनिया में इंसान की वजह से इतना क्लेश हो रहा है, तुम्हें क्या लगता है उसमें जीवहिंसा का योगदान नहीं है? ये जो इतने जानवर रोज़ मारे जा रहे हैं, इनकी मौत का फल तो इंसान को ही भुगतना पड़ेगा ना।
जितनी देर में हमने ये बात की, इतनी देर में लाखों जानवर कट गये। तो इन सबका मुआवज़ा तो इंसान को देना ही पड़ेगा ना। पाप किया है तो फल तो मिलेगा ही। कई बार जो हमें अकारण जो पीड़ा महसूस होती है, जिसे हम और आप समझ भी नहीं पाते हैं कि क्यों हमारी पीड़ा है, उस सब में इस बात का बहुत बड़ा योगदान है कि आदमी ने प्रकृति के साथ, या नदियों और पहाड़ों के साथ, पशुओं और पक्षियों के साथ बहुत दुर्व्यवहार किया है। तो इंसान जितनी

