आचार्य प्रशांत: बाहर जो कुछ भी है, वो तो एफ़र्ट (प्रयास) माँगेगा-ही-माँगेगा। ‘एफ़र्टलेसनेस ’ कहाँ होती है?
प्रश्नकर्ता: मन में।
आचार्य: वहाँ एफ़र्टलेसनेस रहे, वहाँ पर अनावश्यक संघर्ष ना रहे। मानसिक एफ़र्ट का मतलब होता है, बहुत सारी बातें जो सोच रहे हैं, बहुत सारे विकल्प हैं जो सामने आ रहे हैं, और आप उनमें उलझे हुए हैं। बाहर तो अगर आप एक शब्द भी बोलेंगे, तो उसमें एफ़र्ट लगेगा-ही-लगेगा। एक शब्द भी अगर बोला जाता है तो उसमें भी कुछ ऊर्जा लगती है। बाहर की दुनिया में हमारे काम किस लिए होते हैं? जिसका मन अशांत है, वो बाहर बस पाना चाहता है। जिसका मन अशांत है, वो बाहर जो भी एफ़र्ट करता है, वो बस पाने के लिए होता है।
शिव सूत्र में ‘उदयमो भैरव:’ का अर्थ है कि जब मन शांत है, मन एफ़र्टलेस है, तब बाहर पाने जैसी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती है कि बाहर कुछ पाना-ही-पाना है। वो आवश्यकता ख़त्म हो जाती है कि बाहर कुछ पाना-ही-पाना है। और फ़िर बाहर जो कुछ होता है, वो अगर होता है तो इसलिए कि गन्दगी है, साफ़ कर दो; संचय नहीं कर लो, साफ़ कर दो। कुछ पाना नहीं है जीवन में, पाने लायक जो है वो पहले ही है। पाने लायक जो है वो पहले ही है जीवन में। अधिक-से-अधिक सफ़ाई करनी है।
इस बात को समझिए, जिसका मन शांत नहीं है, वो एफ़र्ट करता है पाने के लिए, हमारे जो भी एफ़र्टस होते हैं, वो पाने के लिए एफ़र्टस होते हैं – ‘कुछ पा लूँ’। और जिसका मन शांत हो गया उसके एफ़र्टस होते हैं कि, "जो पाया ही हुआ है, जो इक्कठा किया हुआ है, वो हट किस प्रकार जाए?"

