ब्रह्म सत्य है, ईश्वर भ्रम मात्र || आचार्य प्रशांत (2019)

अविद्योपाधि: सन् आत्मा जीव इत्युच्यते। मायोपाधि: सन् ईश्वर इत्युच्यते।
अविद्या उपाधि से युक्त आत्मा को जीव कहते हैं। माया उपाधि से युक्त आत्मा को ईश्वर कहते हैं।
—तत्वबोध, श्लोक २८-२९
तस्मातकारणात् न जीवेश्वरयोर्भेद बुद्धि स्वीकार्या।
इसलिए जीव-ईश्वर में भेद बुद्धि को स्वीकार नहीं करना चाहिए।
—तत्वबोध, श्लोक ३१
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। गुरु शंकराचार्य ने जीव और ईश्वर के आत्मा से संबंध के बारे में बताया है। मैंने अभी तक दो ही तत्वों के बारे में सुना था, मरणधर्मा जीव और शाश्वत आत्मा। तीन तत्वों का क्या अर्थ है? कृपया स्पष्ट करें।
आचार्य प्रशांत: तुम्हें ‘ईश्वर’ तत्व को लेकर समस्या हो रही है। ऐसे समझो, जीव अपने-आपको आत्मा तो जानता नहीं, जीव अपने-आपको जानता है देह, और देह माने वस्तु। और वस्तुएँ जहाँ होती हैं, उस स्थान को कहते हैं संसार। संसार क्या है? वह आकाश जहाँ वस्तुएँ हैं। और जीव का अनुभव यह रहा है कि जहाँ वस्तु है, वहाँ वस्तु का निर्माता-निर्धाता भी है। गाड़ी है अगर तो कोई है जो गाड़ी को बनाया होगा और कोई है जो गाड़ी को चलाता होगा।

