अपने ऊपर भरोसा क्यों नहीं है? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2015)

प्रश्न: सर, मैं किसी भी काम में कॉन्फिडेंट महसूस क्यों नहीं कर पाता ?
वक्ता: हम्म, कॉन्फिडेंस पर बात करें? कॉन्फिडेंस का मतलब है – ‘यकीन’ । कुछ पक्का जानना । विश्वास, कि ऐसा ही है । हम पाते हैं कि हमें किसी भी बात पर यकीन ही नहीं रहता । अक्सर हम यह शिकायत करते हैं कि आत्मविश्वास की कमी है । शिकायत हमारी यही रहती है ना? कॉन्फिडेंस को तुम लोग आत्मविश्वास के नाम से जानते हो । तुम्हारे शिकायत के शब्द रहते हैं कि हममें आत्मविश्वास नहीं है । लेकिन अगर गौर से देखोगे तो पाओगे कि हमें विश्वास ही नहीं है ।
बात सिर्फ़ आत्मविश्वास की नहीं है । ‘हमें विश्वास ही नहीं है । हमें किसी भी व्यक्ति पर, चीज़ पर, घटना पर, किसी भी बात के होने पर यकीन ही नहीं है । हमें यह भी ठीक-ठीक यकीन नहीं है कि हमारे पाँव-तले ज़मीन है कि नहीं है । यह सुनने में अतिश्योक्ति लगती है, पर बात ऐसी ही है । तुम जिन भी बातों पर बड़ा गहरा यकीन करते हो, कोई आकर, कुछ भारी और तीख़े तर्क देकर, उन सब यकीनों को हिला सकता है । तुम्हारे पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जो जड़ से उखाड़ा न जा सकता हो ।
तम्हें किसी की दोस्ती पर यकीन है और तुम्हें पक्का पता है कि वो तुम्हें धोखा नहीं देगा, तुम्हारे साथ रहेगा, लेकिन आकर दस तर्क दिए जायें, तो ऊपर से तुम भले ही यह कहते रहो “नहीं, नहीं, नहीं, मुझे फर्क नहीं पड़ता । मुझे मेरे दोस्त पर विश्वास है” । लेकिन तुम आन्तरिक रूप से हिल चुके होगे । तुमने कोई पेपर बहुत अच्छा दिया हो, लेकिन कोई तुम्हें आकर बताये कि तुम उसमें फेल हो गए हो, तो भले ही तुम कितना विरोध करो, भले ही तुम कहो कि यह तो हो ही नहीं सकता लेकिन अंदर ही अंदर शक़ का, संदेह का कीड़ा बुलबुलाने लगेगा । तुमको लगेगा कि क्या पता, कोई चूक हो ही गयी हो मुझसे और क्या पता जाँचने वगैरह में कोई गड़बड़ हो गयी हो ।
