वक्ता : कबीर एक न जन्या, तो बहु जनया क्या होई।
एक ते सब होत है, सब ते एक न होई।।
– संत कबीर
संतो का खिलवाड़ है। वो जो एक है –जिसके होने से सब कुछ है– वो अनादी है, वो अजन्मा है। जिसके होने से सब कुछ है वो स्वयं अजन्मा है, तो यह जितने जन्में हुए घूम रहे हैं, इनकी क्या औकात हो सकती है? बात समझ में आ रही है? जन्म पर, जीवन पर, मृत्यु पर, सब पर कबीर का कटाक्ष है यह।
एक का जन्म नहीं हो रहा तो बहुतों के जन्म की तो बात करना ही मूर्खता है न। जो वास्तविक है, जो असली है, जो परम है, जो मूल है जब उसका ही जन्म नहीं हो रहा तो तुम कौन से जन्म को गंभीर और महत्व्पूर्ण माने बैठे हो। जन्म और मृत्यु बच्चों की बातें हैं।
*“एक ते सब होत है, सब ते एक न होई”*।
याद रखना कि अगर वास्तविक को पाना है तो तुम उसकी ओर देखो, उसे अपनी छवि में मत बैठाओ। अगर सच को पाना है तो तुम सच की ओर देखो, सच को अपने जैसा मत बनाने की कोशिश करो।





