प्रश्न: मन की हमेशा से एक आदत होती है कि एक तरह के तौर तरीके से चलना। तो ये बीमारी है या स्वभाव है मन का?
वक्ता: आदत है, स्वभाव नहीं। मन की प्रकृति है और प्रकृति में आप जानते ही हैं कि तमों गुण भी होता है। तीन गुण होते हैं न प्रकृति के। तो वही बंधे-बंधाए ढर्रों पर चलते रहना, उनको परिवर्तित ना होने देना, मन के तामसिक होने का सूचक है बस। स्वभाव वगैरह कुछ नहीं, आदत है।
श्रोता: सर जब बोला जाता है कि संसार के पार जाने वाला मार्ग संसार से ही होकर जाएगा तो ये होता तो इन्द्रियों से ही है पर जब भी मन कुछ असली देख लेता है तो डर के मारे उस राह से पीछे हट जाता है।
वक्ता: जिज्ञासा गहरी हो। इमानदारी से जानने की गहन उत्सुकता हो। उस गहन उत्सुकता को फिर मुमुक्षा कहने लगते हैं। जिज्ञासा गहरी हो। जब जिज्ञासा बहुत गहरी होती है, तो डर से बड़ी शक्ति बन जाती है। देखा नहीं है आपने? करे नहीं है ऐसे काम, जो करते हुए डर लग रहा था? पर बड़ी जिज्ञासा थी कि मामला क्या है, तो कर गए, भले ही वहाँ खतरा था। और वहाँ कोई आध्यात्मिक प्रश्न नहीं था। कोई सांसारिक सी बात थी। लोग कैसे–कैसे खतरे उठा लेते हैं। जब संसार में भी कोई बहुत प्रिय लगने लगता है, तो उसके समीप आने के लिए, उसको जानने के लिए आप कैसे-कैसे खतरे उठा लेते हो। उठाते हैं कि नहीं? तो आप जानते हो खतरे उठाना। उठाओ।
जब जिज्ञासा इतनी गहरी होगी तो आप कहोगे, “अब पता तो लगाना ही है भले ही उसमें खतरा हो।” जैसे कि कोई जासूस, जो कोई राज़ खोलना चाहता हो। तो उसके लिए वो पहुँच जाएगा किसी खतरनाक जगह पर। किसी कातिल के घर पर भी, रात के अँधेरे में। उसे राज़ खोलने हैं। जान का खतरा है, मारा जा सकता है, पर पहुँच जाता है न। पहुँचता है कि नहीं? आपने भी रात के गहरे अंधेरों में कुछ राज़ फाश किये होंगे। कुछ रहस्यों पर से परदे उठाए होंगे, और वहाँ बड़ा खतरा रहता है – क्या पता क्या हो जाए? प्रेमीजनों से पूछिए। पर शरीर की ही इतनी उत्सुकता रहती है कि आप शरीर के भय के आगे निकल जाते हैं। आप कहते हो कि अब जो होगा सो देखा जाएगा और जाने बिना मन मानता नहीं। किये बिना, पाए बिना मन मानता नहीं। अब भले ही उसमें पीटे जाओ, कि टांग तोड़ी जाए, कि जान से जाओ, पर दिल है कि मानता नहीं।


