प्रश्नकर्ता: बाइबल का यह बोध वाक्य कहता है कि, “ध्यान रखो कि तुम इन छोटों में से किसी को तुच्छ दृष्टि से न देखो।” और सूफ़ी ग्रंथों का वचन है कि, “बुराई से नफ़रत करो, बुरे से नहीं।” इन वचनों को मैं पूरे दिल से सदैव अपनाना चाहता हूँ, लेकिन ज्यों ही इन वाक्यों को जीवन में परखने का समय आता है, तो थोड़ी सफलता बाद ही पाता हूँ कि फिर बुरे से नफ़रत शुरू हो गई, तादात्म्य हो गया, और पाता हूँ कि फिर मात हो गई है। माफ़ी माँगता हूँ, तौबा करता हूँ लेकिन फिर तादात्म्य बैठा लेता हूँ।
सूफ़ी संत शम्स तबरेज़ जी का एक बोध वाक्य है कि, “अगर कोई काफ़िर सौ साल भी बोलता रहे तो भी मैं विरोध नहीं करता, न ही मुझे कोई थकान होती है क्योंकि जो थकता है और विरोध करता है, मैंने उसे मार डाला है और तुम लोग शौचालय में बैठे हुए कहते हो कि मुझे जन्नत की सुगंध से तरोताज़ा कर दो।”
मूलभूत शैतानी कहाँ छुपी पड़ी है? बुराई और बुरा, तुच्छ और तुच्छता, क्या ऐसे विभाजन करना उचित हैं? अगर है तो उचित कदम क्या है? कृपया समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: बाहर की कोई भी बुराई हो, है तुम्हारे ही परिप्रेक्ष्य में। अभी आजकल में, इंडोनेशिया में सुनामी आई, सैकड़ों लोग उसमें मारे गए। किसी भूकंप से उठी थी वो सुनामी। कितने लोग उसमें प्रभावित हुए। जानते हो, इस पृथ्वी पर कोई क्षण नहीं जब भूमि का कम्पन न हो रहा हो। भू तो लगातार कम्पित हो ही रही है। अभी मैं यहाँ बैठा हूँ, मेरे क़दमों के नीचे की ज़मीन काँप रही है, और तुम जहाँ बैठे हो, वहाँ भी तुम्हारे पैरों के नीचे की ज़मीन कम्पित हो रही है। पर उसको तुम भूकंप मानते ही नहीं, क्यों नहीं मानते? तीव्रता, तीव्रता नहीं है और उससे कुछ खतरा नहीं है। तो तुम ये भी नहीं कहते कि, “भूकंप बहुत मंद है,” तुम कहते हो, “भूकंप है ही नहीं।” और वही तीव्रता जब बढ़ जाती है, तो वो होता है जो आज इंडोनेशिया में हुआ। और किसी तरीके से अगर मनुष्य में और मनुष्य की इमारतों में ये ताक़त होती कि रिक्टर स्केल(भूकम्पमापी यंत्र) पर आठ तीव्रता का भूकंप भी वो झेल जाते, तो आज इंडोनेशिया में भी जो हुआ क्या उसको वो भूकंप मानते? नहीं मानते न? तो अब मुझे बताओ बुराई क्या है? मैंने कहा था, बुराई तुम्हारे ही सन्दर्भ में होती है सदा, तुम्हारे ही परिप्रेक्ष्य में।


