स्त्री का विकास, परंपरा, और आधुनिकता || डॉक्टरों व मेडिकल छात्रों के संग (2018)

प्रश्नकर्ता: भारतीय समाज में पुराने ज़माने में महिला त्याग, संस्कार, और विनम्रता की मूर्ति हुआ करती थी। आज की आधुनिक महिला ग़लत को 'ग़लत' और सही को 'सही' बोलती है। क्या सही है? वो सही था, या ये सही है?
आचार्य प्रशांत: जो सही है, वो सही है। ना वो सही है, ना ये सही है, जो सही है वो सही है। आवश्यक थोड़े ही है कि इसमें और उसमें ही कोई सही हो, ये भी तो हो सकता है कि जो सही हो, वो कोई तीसरा हो। ये भी तो हो सकता है कि सच्चाई कहीं बीचों-बीच हो, इधर-उधर हो; आप ज़मीन पर खोज रही हैं, दाएँ या बाएँ, सच्चाई आसमान में हो। किसी और आयाम में भी तो कुछ हो सकता है न। बैठिए, बात करते हैं।
देखिए, पहली बात तो ये है कि नारी विमर्श में आज पुरानी नारी को जितनी दयनीय हालत में दर्शाया जाता है, उतनी दयनीय हालत में वो थी नहीं। निश्चित रूप से उसका शोषण भी होता था, निश्चित रूप से उसके अधिकार भी कुछ कम थे, निश्चित रूप से उस पर कुछ वर्जनाएँ थी, पर जितना आधुनिक विमर्श में उसको बेचारगी की हालत में दिखाया जाता है, उतनी बेचारगी की हालत में वो कभी नहीं थी।
आप पुराने ग्रंथों को देखें, आप कहानियों को देखें, जो उस समय के समाज का खाँका आपके सामने खींचती हों, प्रतिबिंबित करती हों। उसमें आपको दिखाई देगा कि महिलाओं के भी अपने पुख़्ता हक थे, और बहुत मजबूत महिलाएँ भी हुआ करतीं थीं। ऐसा ही नहीं था कि वो बेचारी बस दमित ही थीं और पुरुष वर्ग उनका लगातार शोषण ही करे जा रहा था। ये तो हमने कहानी को पूरा पोत दिया एक काले रंग से।
दीवार पर कई रंग थे, पर चूँकि हमें ये दिखाना था कि हम सफ़ेद हैं, तो हमने उस पुरानी दीवार को पूरा ही काला पोत लिया। जब जिसका तुम विरोध कर रहे हो, वो पूरा काला दिखाई देता है, तो तुम्हारी सफ़ेदी में और रौनक आ जाती है न, "देखो, वो कितने काले थे, हम कितने सफ़ेद हैं!" नहीं।


