शाश्वत उन्मत्तता प्रेम की || आचार्य प्रशांत, संत रूमी पर (2013)

वक्ता : रूमी की कुछ पंक्तियाँ- ‘प्यार में तुम्हारे नशे के अलावा और कुछ भी शाश्वत नहीं है ! अपना जीवन लेकर तुम्हारे सामने आया हूँ ! मेरे पूरे जीवन का परिणाम है तुम तक पहुँचना, सिर्फ अपने जीवन का उत्सर्ग कर देने के लिए, सिर्फ अपना जीवन तुम पर न्यौछावर कर देने के लिए ! मैंने कहा कि तुमको जानना चाहता हूँ और उसके बाद ‘होने’ की कोई इच्छा नहीं है ! मिट जाना चाह्ता हूँ ! उसने कहा कि मुझे जानने का अर्थ ‘मिट जाना’ नहीं है ! प्यार में नहीं है कुछ भी शाश्वत तुम्हारे नशे के सिवा !
सब कुछ बदलता रहेगा। बाहर की स्थितियाँ हैं, परिस्थियाँ हैं, आती-जाती रहेंगी। परिस्थिति का अर्थ ही है वो जो बाहरी है, उसका काम है बदलना, हमेश बदलती रहेगी। जीवन एक निरंतर मूवमेंट है, फ्लक्स है। कुछ भी शाश्वत नहीं है उसमें। पर जब वो एक आन्तरिक प्रकाश होता है, आन्तरिक जानने की अवस्था होती है, उसमें एक गहरा नशा होता है। बाहर-बाहर कुछ और चल रहा होता है और भीतर मौज चल रही होती है। बाहर से हो सकता है की आप दिखाई दें बड़े गंभीर और भीतर-भीतर एक सुरूर चढ़ा होगा। सब कुछ उस सुरूर में ही हो रहा होगा। इसी का नाम प्रेम है, इसी का नाम जीवन है, यही है जानना।जरूरी नहीं है कि बाहर से वो दिखाई ही दे। दिखेगा, पर उन्हीं आँखों को जो खुद नशे में होंगी। वो तो जान जायेंगी कि आप पूरे तरीके से दीवाने ही हैं। बाकि आँखें जान भी नहीं पाएँगी कि कौन सा नशा है जिसमें आप बहे हुए हो, जो आप से ये सब कुछ करवा रहा है। आप जानते हो, दिन आएंगे, रात आएंगी, पर अन्दर जो नशे का मौसम है, वो नहीं बदलेगा। प्यार में नहीं है शाश्वत कुछ भी तुम्हारे नशे के सिवा, अपना जीवन ले कर के आया हूँ तुम तक, उसको होम कर देने के लिए, सिर्फ उसकी आहुति दे देने के लिए !
अज्ञेय की पंक्तियाँ हैं – वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहनकारी हाला है, वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है, मैंने आहुति बन कर देखा, ये प्रेम यज्ञ की ज्वाला है! इसी फ़ना हो जाने का मतलब है प्रेम ! पूरे तरीके से मिट जाना, ना कि अतिसंवेदनशीलता ! क्या है जो गायब होगा ? क्या है जो प्रकट होगा ? जो प्रकट होगा उसके गायब होने की सम्भावना हमेशा रहेगी ! जो कुछ भी गायब हो सकता है, उसके जानने का नाम है ‘प्रेम’ ! प्रेम उसे जानने की प्रक्रिया है। प्रेम प्रकट होने, गायब होने, आने-जाने के द्वैत से आगे जाने का नाम है। ये आना-जाना बंद नहीं हो जाएगा, आने-जाने के साथ, दौरान, पीछे, एक नशा बना रहेगा। आ रहे हैं, जा रहे हैं, जो होना है हो रहा है, मौसमों का बदलना, घटनाओं का घटना, ये सब चल रहा है, पूरे तरीके से चल रहा है, पर पीछे-पीछे एक नशा बना हुआ है। उस नशे में जो कुछ भी द्वैतात्मक है, उससे मैं आगे चला गया हूँ, और आगे जाने का अर्थ है, ‘उसको पार कर गया हूँ ‘। वो असर नहीं डालता मुझ पर अब !

