प्रश्नकर्ता: मैं जब ग्रंथों, गुरुओं और बुद्धपुरुषों के पास जाता हूँ, तो मेरे मन में तत्काल श्रद्धा जग जाती है, मन एकदम से चिल्ला उठता है कि यही हैं सच्चे गुरु, पर बाद में यही एहसान-फ़रामोश मन संदेह करने लगता है।
आचार्य जी, मेरी मनोस्थिति आपके सामने है। कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: तुम्हें शायद अफ़सोस इस बात का है कि मन संदेह क्यों करने लगता है। अफ़सोस ये होना चाहिए कि “मन पूरा संदेह क्यों नहीं कर रहा?” लज्जा या ग्लानि मत अनुभव करो अगर तुम्हें गुरु पर या ग्रंथ पर शक़ हो गया है। भली बात है कि शक़ हुआ। तुमने थोड़े ही किया है शक़; शक़ तो तुम्हारी रग-रग में बह रहा है।
जैविक विकास की प्रक्रिया में शक़ का बड़ा योगदान था। मान लो, किसी एक दिशा से तुम पर आक्रमण हो रहा है—तुम जंगल में बसते हो, तुम बहुत पुराने आदमी हो—किसी एक दिशा से कोई पशु तुम पर आक्रमण करने आ रहा है, और तुम्हें कुछ शक़-सा हुआ है और तुम चारों दिशाओं पर शक़ करने लगे कि कहीं तो कुछ गड़बड़ है। तो तुम्हारा शक़ निन्यानवे प्रतिशत तो ग़लत ही है, क्योंकि सभी दिशाओं से तो पशु आ नहीं रहे तुम पर आक्रमण करने, तो निन्यानवे प्रतिशत तो तुम व्यर्थ संदेह कर रहे हो, पर एक प्रतिशत तुमने बिलकुल ठीक पकड़ा है, और ये जो एक प्रतिशत है, ये तुम्हारी जान बचा देता है, है न?
जब तुम शक़ करते हो कि किसी दिशा से तुम पर आक्रमण हो रहा है, तो तुम हर दिशा के प्रति चौकन्ने हो जाते हो। टटोलोगे और दिख जाएगा कि “अच्छा अच्छा! उधर से आ रहा था।” तो शरीर को बचाए रखने के लिए शक़ उपयोगी चीज़ रहा है करोड़ों सालों से। शक़ कोई इतनी भी घिनौनी बात नहीं है, लजा क्यों रहे हो? अगर आदमी शक़ करना ना जानता होता, तो आज आदमी जीवित नहीं होता।


