प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई रिश्ते ऐसे होते हैं जो न चाह कर भी पीछे छूट जाते हैं, क्या उन्हें दोबारा पाया जा सकता है?
आचार्य प्रशांत:
“जिस समय निर्विकल्प समाधि द्वारा आत्मा का दर्शन होता है, उसी समय हृदय की अशानरूप गांठ का पूर्णत: नाश होता है।”
~ अध्यात्म उपनिषद
(श्लोक संख्या: १७)
“आत्मा के ऊपर ही आत्म-भाव को दृढ़ करके अहंकार आदि के ऊपर वाले आत्म-भाव का त्याग करना। घड़ा, वस्त्र आदि पदार्थों से जिस प्रकार उदासीन भाव से रहा जाता है, उसी प्रकार अहंकार आदि की तरफ से भी उदासीन भाव से रहना।”
~ अध्यात्म उपनिषद
(श्लोक संख्या: १8)
जब हृदय में सत्य के प्रति निष्ठा होती है, तब बाहर भी सत्य ही दिखाई देता है। ऐसे समझ लो कि तुमने अगर अपने भीतर के झूठ को काट दिया, उसे सहारा और ऊर्जा ना दी, तो बाहर भी जो झूठ बिखरा पड़ा है, तुम उसके शिकार नहीं बनोगे। यही बात उपनिषद् कह रहा है।


