सतह पर जुड़ते हो, इसलिए बिछुड़ने में दर्द होता है || आचार्य प्रशान्त (2016)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी एक प्रश्न है, “आसक्ति से कैसे बचा जाए?”
आचार्य प्रशांत: क्यों बचा जाए?
श्रोता१: क्योंकि वो नुकसान दे सकती है आपको।
आचार्य प्रशांत : कैसे नुकसान देती है?
श्रोता१: जब आपसे अलग हो जाएगी।
आचार्य प्रशांत : इसमें ये कहाँ पर है कि आसक्ति का मतलब है कि वो अलग हो नहीं सकता? समझना इस बात को। आप ये समझते हो कि किसी की और आकर्षित होने का नाम है आसक्ति। आप ये समझते हो किसी से जुड़ जाने का नाम है आसक्ति। आपने ठीक से देखा नहीं। किसी से जुड़ जाने का नाम नहीं है आसक्ति या आसक्ति। किसी से सतही तौर पर जुड़ जाने का नाम है आसक्ति।
ये किताब है, ये मेज के ऊपर रखी है, इस किताब के नीचे ज़रा सा फेविकोल लगा दो, आसक्ति हो जाएगी। मेज से हो जाएगा। हैना? ठीक है? तुम कहोगे आसक्ति हो गई, मैं कहूँगा कुछ भी नहीं हुआ, सतह से सतह जुड़ी है, एक पन्ना है उसका जो जुड़ गया है, जो उसका आखिरी पृष्ठ है। जो उसका कवर पेज है, वो जुड़ भर गया है नीचे मेज से, बाकी तो किताब नहीं ही जुड़ी है। किताब खंड खंड है, किताब पन्ना-पन्ना है। किताब के बाकी पन्ने तो अपनी कहानी कह ही रहे हैं। पंखा चलेगा, पन्ने उड़ेंगे।

