प्रश्न: आचार्य जी, क्या सपनों में गुरुदर्शन का महत्त्व है?
आजकल कई बार ऐसा हो रहा है कि मेरे गुरुजी सपनों में आ रहे हैं। उनके द्वारा कही गयी बात सुनाई तो देती है, महसूस भी होती है, पर मैं यह समझ नहीं पा रहा हूँ कि वो कहना क्या चाह रहे हैं, क्या समझाना चाह रहे हैं। पर यह महसूस ज़रूर होता है कि कुछ कहना चाह रहे हैं ।
आचार्य प्रशांत जी: अच्छा लक्षण है यह। इससे यही पता चलता है कि मन सीखने को तैयार हो रहा है। मन इतना तो मान ही रहा है कि गुरु की सत्ता होती है, मन ने इस बात को गहराई से स्वीकृति दे दी है कि गुरु जैसा कुछ होता है।
गुरु क्या कह रहा है ये भले ही न समझ आ रहा हो, पर इतना भी मान लेना बहुत होता है कि गुरु की सत्ता होती तो है।
समझना इस बात को।
इतना भी आसान नहीं होता है। ये तो बहुत ही दूर की बात है कि गुरु के कहे को गह लिया, समझ लिया, या गुरु के समक्ष नतमस्तक हो गये। ये तो बहुत-बहुत आगे की बात है। मन के लिये इतना भी आसान नहीं होता कि वो मान ले कि मन के आगे, मन से बड़ा, मन के अतीत, मन के परे भी कुछ होता है।
मन की पूरी ज़िद यही मानने की रहती है, इसी दुराग्रह की रहती है कि – “जो है सब मेरी सीमाओं के भीतर है, जो है उसका मुझे अगर अभी पता नहीं भी है, तो कल पता लग जाएगा। मैं जैसा हूँ, वैसा रहते हुए भी कल मुझे, जो आज अज्ञात है, कल ज्ञात हो जाएगा। तो मुझे किसी के सामने झुकने की ज़रुरत नहीं। कुछ मुझे पता है, स्वयं ही पता है, अनुभवों से पता है, और जो मुझे पता नहीं वो मुझे कल के अनुभवों से पता चल जाएगा,” – ऐसा मन का आग्रह होता है।

