संकोच माने क्या? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)

प्रश्न: आचार्य जी, क्या संकोच न करने का अर्थ है कि कुछ भी कर सकते हैं, बोल सकते हैं?
आचार्य प्रशांत जी: संकोच न होने का अर्थ यह है कि – “मुझे जो करना है वो भी बे-खटके करना है, और जो नहीं करना है उसमें भी मुझे दिक्कत नहीं हो रही कि मैं क्यों नहीं कर रहा।”
अगर आप कुछ जानते ही हो कि नहीं बोलना है, तो बस नहीं बोलना है, शांत रहो। यह विचार ही बार-बार मन में न आए कि – “बोल ही दूँ क्या?” फ़िर थोड़ी खुजली-सी हुई – “अच्छा चलो बोल ही देते हैं।” फ़िर लगा नहीं बोलते, अच्छा बैठ जाओ।
‘संकोच न होना’ दोनों दिशाओं में काम करता है — बोलना है तो बिना संकोच के, और यदि चुप बैठना है तो चुप बैठने में भी कोई दिक्कत नहीं हो रही है। चुप हैं तो हैं, शांत हैं तो पूरी तरह शांत हैं, स्थिर हैं। यह नहीं लग रहा कि – क्यों स्थिर हैं? “काश मैं बोल सकता,” यह विचार नहीं आ रहा है। फ़िर हम मौन हैं, शांत हैं, बिलकुल शांत हैं।
‘संकोच’ का उल्टा अर्थ मत निकाल लेना। कोई संकोच नहीं करता, इसका अर्थ यह नहीं है कि वो पूरा मनमौजी हो गया है, निरंकुश हो गया है। ‘संकोच नहीं है’ इसकी एक ही जायज़ वजह हो सकती है — स्पष्टता। स्पष्टता में अगर शांत भी बैठे हो, तो बढ़िया।
हम संकोच न होने का आमतौर पर यह अर्थ निकालते हैं कि यह बिंदास है, कुछ भी जाकर बोल आता है। यह अधूरी बात है, आधी बात है।
