प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। बोध का अर्थ शायद अनुभूतिपूर्ण अपरोक्ष ज्ञान है। जगद्गुरू आदिशंकराचार्य ने इसके लिए जो आवश्यक साधन-चतुष्टय बताए हैं, उनको उपलब्ध किए बिना इस ज्ञान का सिर्फ़ श्रवण या पठन क्या एक दुविधा अथवा एक प्रकार का मानसिक अनुकूलन नहीं पैदा करेगा? यह दुविधा या मानसिक अनुकूलन या जान लेने का भ्रम जीव या मनुष्य के संघर्ष या तपन को नहीं बढ़ाएगा?
साधन-चतुष्टय का इंजन या साधन श्रद्धा है। आज के कठिन समय में श्रद्धा सबसे दुर्लभ है। गुरु और शास्त्र में एकनिष्ठ विश्वासरूपी श्रद्धा बिना अहैतुकी कृपा के क्या प्रयासों से संभव है? मेरा नितांत निजी अनुभव है कि प्रयासों से श्रद्धा नहीं अर्जित की जा सकी, जीव सिर्फ़ ईमानदारी से रो सकता है। कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: तो कौन कह रहा है कि साधन-चतुष्टय अर्जित किए बिना तुम ज्ञान की दिशा में आगे बढ़ो? समूचा तत्वबोध है ही इसीलिए कि तुमको पता चले कि साधन क्या हैं और तुम इन साधनों का अपने-आपमें विकास कर सको।
निश्चित रूप से तुमने जो आशंकाएँ व्यक्त की हैं, वो आशंकाएँ निर्मूल नहीं हैं। बिलकुल ठीक कह रहे हो कि जिसमें मुमुक्षा नहीं, जिसमें वैराग्य, विवेक नहीं, जिसमें शम, दम, तितिक्षा, उपरति, श्रद्धा इत्यादि नहीं, वो अगर ग्रन्थों का अध्ययन करेंगे तो वो ग्रन्थों से अर्जित ज्ञान का अपने विनाश के लिए ही दुरुपयोग कर लेंगे। ठीक कह रहे हो, बिलकुल ठीक कह रहे हो। तो सावधान रहो न। ये जितने साधन बताए गए हैं, इन साधनों पर ज़रा नियंत्रण कसो, इन साधनों को अपने-आपको उपलब्ध कराओ, फिर आगे बढ़ो।
फिर पूछा है, श्रद्धा के बारे में कि "श्रद्धा प्रयासों से प्राप्त नहीं की जा सकती, जीव सिर्फ़ ईमानदारी से रो सकता है।” तो ठीक है, ईमानदारी से रो लो। आदिशंकर श्रद्धा की व्याख्या भी दे रहे हैं, कह रहे हैं, “गुरु और वेदान्त के वाक्यों में, वाणी में विश्वास रखना, यही श्रद्धा है।”


