बाहर से उज्जवल दसा, भीतर मैला अंग।
ता सेतो कौवा भला, तन-मन एक ही रंग।।
–दरियादास
वक्ता: सवाल यह है कि क्या एक रंग होना काफ़ी है? रंग भले ही एक है, पर काला रंग है रंग एक होगा, पर मुख राम की ओर नहीं है, तो भला कैसे हो सकता है?
दरियादास का है, *“*ता सेतो कौवा भला, तन-मन एक ही रंग”।
‘एक होना, कोई साधारण घटना नहीं है।’ एक हुआ ही नहीं जा सकता, परमात्मा के आलावा किसी और दिशा में। संभव नहीं है। हम कहते हैं, ‘‘परमात्मा के प्रति एकनिष्ठ होना चाहिए।‘’ हम व्यर्थ ही बहुत सारे शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। न कहिए कि परमात्मा के प्रति एकनिष्ठ होना चाहिए। सिर्फ़ इतना कहिए कि एकनिष्ठा होना चाहिए क्यूंकि एकनिष्ठता सिर्फ़ परमात्मा के प्रति ही हो सकती है।
नाम लेने की आवश्यकता नहीं। आदमी का मन बंटा-बंटा जीता है। हज़ार खण्डों में विभक्त रहता है और मन का जो मूल है, उसका जो केंद्र है, वो समर्पित रहता है परमात्मा को। उसका समर्पण बदल नहीं सकता। बाकी सारे खंड आते-जाते रहते हैं।




