आचार्य प्रशांत: एक उपनिषदिक् वाक्य है;
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः
जो बलहीन है वो कभी भी अपने करीब नहीं पहुँच सकता। जो इतना डरपोक, मुर्दा और निर्बल है कि उसको अंतर पड़ने लग जाए कि दस लोग क्या बात कर रहे हैं इधर-उधर की, उसके बस की ये सब बातें नहीं हैं। मैं यहाँ पर किसी हॉस्पिटल के इमरजेंसी वार्ड में बात नहीं कर रहा हूँ। मैं ये सब बोल रहा हूँ यह सोच कर कि मेरे सामने युवा लोग बैठे हैं, जिनके पास एक स्वस्थ मन है और एक बलिष्ठ शरीर है और जिनको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है कि उनको आकर कोई क्या बोल गया। जो इस बात की बहुत परवाह करते हों कि दुनिया क्या कहेगी और किसकी नज़रों में उठेंगे और किसकी नज़रों में गिरेंगे, उनके बस का तो वैसे भी कुछ नहीं होता। वो तो किसी तरह ज़िन्दगी बिता कर मर जाते हैं और कहते हैं, ‘अरे! अच्छा हुआ मर गए, मुक्ति मिली। पता है, मैं एक बुरे सपने में फँस गया था, मेरे साथ एक हादसा हो गया था।' क्या हादसा हो गया था? 'अरे, मुझे ज़िन्दगी मिली थी!’
(सभी श्रोतागण हँसते हैं)
तो ज़िन्दगी उनके लिए हादसा बराबर ही है और मैं उम्मीद कर रहा हूँ कि यहाँ पर दो-चार लोग ऐसे ही बैठे हैं जो इस हादसे से गुज़र रहे हैं। उनके लिए रोज़ एक हादसा रहता है। किसी दिन दोस्त ने कुछ बोल दिया, किसी दिन फेसबुक पर फ़ोटो लगाई तो किसी ने कमेंट में लिख दिया, ‘अच्छे नहीं लग रहे।’ अब ये हादसा है इनके लिए। बाल कटवा कर आ रहे हैं और किसी ने पूछा, ‘कितने पैसे दिए? सौ रुपये? अरे! सौ रुपये मुझे ही दे देता, ये क्या कटोरा-कट कटवा कर आ गया।’ अब बाल १ दिन में तो उगेंगे नहीं और अब जब तक वो बाल लम्बे नहीं हो जाएँगे, उतने दिन तक ये अपनी शक्ल नहीं देख सकते क्योंकि दो-चार लोगों ने बोल दिया है कि तुम बड़े...


