न वर्चस्व की ठसक, न निर्भरता की कसक || आचार्य प्रशांत, युवओं के संग (2012)

आचार्य प्रशांत: तुम एक बार ये समझ गए के ये डोमिनेशन(वर्चस्व) है, फिर ये काम कर नहीं सकता ! यह काम ही सिर्फ तभी करता है जब तुम नहीं जानते की ये वर्चस्व है ।
तुम वर्चस्व को कई बार प्यार समझ लेते हो, तुम वर्चस्व को कई बार हिफाज़त समझ लेते हो । तुम वर्चस्व को कई बार नियम समझ लेते हो । वो इसलिए काम कर रहा है । जैसे तुम्हें ये बात समझ में आ गई की ये कुछ नहीं है वर्चस्व है, तब काम करना बंद कर देगी । देख लो, बस साफ़-साफ़ देख लो कि ये है । तब यह काम नहीं करेगी । उसको, जो उसके दूसरे रूप हैं, जो वो छवियाँ ले के आ रहा है वर्चस्व है, झूठी छवियाँ बड़ी-बड़ी, ले कर के आ रहा है; उसके पीछे देख लो, ये और कुछ नहीं है वर्चस्व ही है ।
ये कहने को ख्याल और चिंता है, पर वास्तव में ये सिर्फ वर्चस्व है । यदि एक बार तुम समझ गए, तब कुछ बचेगा नहीं । उसके बाद जो तुम्हें करना है, वो तुम खुद करोगे । फिर तुम्हें किसी से पूछने की, समझने की और ज़रुरत नहीं है । और वो काम भी याद रखना, सिर्फ और सिर्फ डायरेक्ट ऑब्ज़रवेशन (सीधा प्रेक्षण) से होगा । याद कर के नहीं । कभी जब चल रहा हो ना, तो उसी वक़्त समझना- अच्छा, तो ये चल रहा है । ठीक है, मैं समझ गया । समझे? हाँ? बोलो ? तुम्हारा जीवन है, याद रखना, न की मेरा ! बोलो ! कुछ समय में हमारी बातचीत खत्म हो जाएगी ।
अवसर जो है, उसका फ़ायदा उठाओ । बोलो ! नहीं तो गाय होगी तुम्हें याद दिलाने के लिए । बोलो !
तुम ही बोलते रहोगे? ये भी एक अधिकार है, जब बोल रहे हो सबके हेतु तो कुछ भी गलत नहीं है । यहाँ तक की ये बढ़िया बात है की ये बोल रहा है पर बाकी क्यूँ नहीं बोल सकते? हाँ, बोलो ?
