प्रश्न: ‘कोहम्’ का वास्तविक उद्देश्य क्या है?
वक्ता: यह विचार कोई ज़बरदस्ती करने वाली क्रिया नहीं है। साधना की कोई विधि अपनेआप में नहीं हो सकती। विचार आपके पास पहले ही बहुत सारे हैं। अध्यात्म है ही उनके लिए जिन्हें कहीं कुछ शंका हो, या जिन्हें कहीं कुछ दुविधा हो। तो आप शुरुआत यहाँ से करते हो कि कष्ट है, शंका है, दुविधा है।
फिर क्या होता है? अगर मैं वाकई ईमानदार हूँ, और मैं अपनी स्थिति के प्रति ज़रा जागरूक हूँ, तो मैं कहता हूँ: “भूल है”। कष्ट उसका प्रमाण है। फिर? फिर आप क्या कहेंगे?(श्रोतागण से पूछते हुए) बहुत कल्पना मत करिये। आम ज़िन्दगी में जो होता देखते हैं, बस वही बात दीजिये।
श्रोता १: वो गलती सुधारते हैं।
वक्ता: ठीक। यही होता है। तो अगली बात आप बोलते हो कि कष्ट है, कष्ट दूर करूंगा। कष्ट दूर हो। और आप कोशिश करते हो। उन्हीं कोशिशों में से एक कोशिश बोध और अध्यात्म भी होती है। ‘कष्ट दूर हो सके’, यह कोशिश कभी कुछ समय के लिए सफल होती है, कभी लम्बे समय के लिए सफल होती दिखती है, पर इसमें न आख़िरी सफलता मिलती है, न आख़िरी असफलता। आप इतना भी नहीं हारते कि आप टूट जाएँ, और कोई जीत आपको अंतिम भी नहीं मिलती। इतना ज़रूर होता है कि आप यदि सतर्कता से देख रहे हैं, तो पा जाते हैं कि आपका ज़ोर तो नहीं चल रहा है। आप वही-वही भूलें दोहरा रहे हैं, जो आप पहले कर रहे थे; नए रूप में हो सकता है, नई परिस्थितियों में हो सकता है। तो आप यह समझ जाते हैं कि जो दावा करने वाला है, वो अविश्वसनीय है। जो दावा करता है बार-बार कि अब यह करते हैं, अब वो करते हैं। उसपर यकीन नहीं किया जा सकता। आपने आज तक उस दावा करने वाले को क्या समझा था? विश्वसनीय? परिचित? यकीनी? हाँ?

