प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे कबीर साहब ने कहा है कि ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय। तो क्या ये इंसान से प्रेम करने की बात कह रहे हैं? मुझे लगता है कि ये इंसान से प्रेम करने की बात कह रहे हैं क्योंकि वो देखते हैं कि जग में ऐसा है नहीं, तो जिसने इंसान से प्रेम करना सीख लिया वो सबसे बड़ा ज्ञानी है। हम अपनी फिल्मों में भी देखते हैं कि हर कोई प्रेम की भगवान से तुलना करता है — लव इज गॉड (प्रेम ही भगवान है)। यदि प्रेम इतना महत्वपूर्ण है तो एक इंसान का दूसरे इंसान से प्रेम कर पाना इतना मुश्किल क्यों है?
आचार्य प्रशांत: कौन करेगा प्रेम इंसान से?
प्र: हम ही करेंगे।
आचार्य: हम माने कौन? कौन हो तुम?
प्र: मैं अपने लिए भी बताता हूँ तो मेरे लिए भी बहुत मुश्किल है।
आचार्य: कौन हो तुम? उसी से पता चलेगा न प्रेम क्या होगा तुम्हारा?
आज हमने शुरुआत करी थी, हमने कहा था एक ही चीज़ है जिसको हम जानते हैं कि ‘हम हैं’। ठीक? 'आई एम' (मैं हूँ) और हमने कहा था ये जो आई एम है, ये जो मेरा होना है, ये अपने होने का एहसास कराता है किसके द्वारा?

