नाहं कालस्य, अहमेव कालम्। ~ नारायण उपनिषत
आचार्य प्रशांत: तथ्य तो ये है कि स्थान और समय सिर्फ़ दिमाग की उपज हैं। जगह और समय यहीं पर हैं, कहीं और नहीं। हमको ये लगता है कि समय बह रहा है, एक नदी की तरह और हम उसमें हैं। तुम्हें लगता है कि "अभी मैं यहाँ पर हूँ" और फिर कहते हो कि, "चार बजे मैं वहाँ पहुँच जाऊँगा", जैसे कि तुम समय में हो। उपनिषदिक् दृष्टा यहाँ पहली पंक्ति में बोल रहे हैं कि "नहीं, मैं समय में नहीं हूँ, समय मुझमें है।"
मैं जगह में नहीं बैठा हूँ, जगह मुझमें है।
अब ये सुनने में बहुत अजीब सा लगेगा, तुम कहते हो कि, "मैं इस कमरे में बैठा हुआ हूँ।" नहीं, तुम इस कमरे में नहीं बैठे हो, ये कमरा तुममें बैठा है। पर तुम अगर इस बात को सोचना चाहोगे तो ये दिमाग घूम जाएगा। तुम कहोगे, "ये कमरा मुझमें बैठा है तो मैं कहाँ बैठा हूँ? मुझे भी तो कहीं-न-कहीं होना चाहिए।" और जब तुम कहते हो कि, "मुझे कहीं होना चाहिए" तो तुम फिर कह रहे हो कि मुझे ‘जगह’ में ही होना चाहिए। तो घूम-फिर कर ये ख्याल पीछा ही नहीं छोड़ रहा है कि "मैं जगह में ही हूँ, मैं समय में ही हूँ।" ये ख्याल हमारे मन में गहराई से डाल देने में विज्ञान का बहुत बड़ा योगदान है; हमारी इंद्रियों का बहुत बड़ा योगदान है और शरीर का बहुत बड़ा योगदान है।
तुम शरीर से पैदा होते हो। तुम हर चीज़ शरीर से ही पहचानते हो। ये जो पहली पंक्ति है, नारायण उपनिषद से है – नाहं कालस्य, अहमेव कालम्। इस देश में बहुत पहले ये जान लिया गया कि ‘समय’ को और ‘मृत्यु’ को एक ही शब्द देना बहुत ज़रूरी है। इसलिए समय और मृत्यु के लिए ‘काल’ शब्द का प्रयोग किया गया। इस ‘काल’ शब्द को तुम दो तरीकों से पढ़ सकते हो।


