झूठी धारणाओं से भरा यदि मन, झूठे सम्बन्धों से भर जाएगा जीवन || आचार्य प्रशांत (2015)

‘तुम अपने थे, अब पराये हो गए हो’, ऐसा कोई क्यों बोलता है?
वो ‘पराया’ है, इसलिए बोलता है!
पहले छुपा-छुपा परायापन था, अब दिखा-दिखा परायापन है। जो पहले परोक्ष था, अब समक्ष है, प्रत्यक्ष है। परायापन सदा से था, अपनेपन का पर्दा था, अपनेपन का भ्रम था। कई बार ढोंग था। अब बात ज़रा खुल गयी है। अब बात ज़रा परदे से बाहर आ गयी है। पहले स्वांग दोनों पक्षों की ओर से चलता था। पहला पक्ष भी बोलता था, ‘तुम मेरे हो’, दूसरा पक्ष भी बोलता था, ‘तुम मेरे हो’; था कोई कभी किसी का नहीं, कभी भी नहीं था। स्वार्थवश और मोहवश जुड़ाव था; स्वार्थ हट गए, मोह घट गया, जुड़ाव ख़त्म हो जाता है। पर अगर जुड़ाव ऐसे ख़त्म हुआ, तो स्वार्थ जब दोबारा आयेंगे, और मोह जब दोबारा उत्पन्न होगा, तो जुड़ाव फ़िर से आजायेगा।
एक दूसरा भी कारण होता है, जिसमें ये जो झूठा अपनापन होता है, ये हटता है। झूठा अपनापन तब भी हटता है जब आपके भीतर जो कुछ झूठा है वो हटे। झूठा अपनापन आपके संबंधों में तभी तक रहेगा जबतक आपके भीतर बहुत कुछ झूठा विद्यमान हो; जब आपका मन ही झूठ से भरा हुआ हो। जिसके जीवन से वो सब कुछ चला गया जो झूठा था, उसके सम्बन्धों से वो अपनापन भी चला जाएगा जो झूठा था। और तब ज़मीन तैयार होती है वास्तविक अपनापन लाने की, और तब संभावना पैदा होती है कि जो असली है वो उतर सके।
पर जो असली है वो आपके लिए बड़ा अपरिचित है, उसे आप जानते नहीं, आपकी परिभाषाओं में वो अपनापन कहलाता नहीं। आप जिसे प्रेम कहते हो, वैसा वो दिखता नहीं। वास्तविक अपनापन जब आपके सामने आयेगा तो वो आपको बड़ा पराया सा लगेगा। बड़ी हास्यास्पद बात है, पर बड़े दुःख की भी बात है। जो वास्तव में आपका अपना है, वो आपको बहुत पराया लगेगा क्योंकि जितने झूठे और पराये हैं उनको आपने अपना समझ रखा है, और वही आपकी परिभाषा बन चुकी है अपनेपन की; और परायेपन की परिभाषा भी अपनेपन की परिभाषा पर ही तो निर्भर होती है।

