इन्हें तुम ज़रूरतें कहते हो? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2015)

श्रोता: सर, एक तरफ़ तो हमारी सारी ज़रूरतें पूरी नहीं हो पाती हैं| और दूसरी तरफ़ दुनिया में हर वक़्त हमें आँका जा रहा होता है| ऐसे में हम परिस्तिथियों के ग़ुलाम बन कर रह जाते हैं| इस दशा को सुधारने के लिये क्या करें?
वक्ता: बेटा ज़रूरतें हमारी बहुत ज़्यादा होती नहीं| अक्सर हम जिसको ज़रूरतों का नाम देते है, वो कोई और चीज़ होती है| ये सवाल मैं कई बार पूछ चूका हूँ और तुम पढ़ भी चुके हो कई बार, पर फिर से पूछ लेता हूँ- कितनी ज़रूरतें है तुम्हारी? कितना खर्च करते हो महीने का? कितना खर्च करते हो? बताओ अपनी ज़रूरतें| पूछना क्या है? (हँसते हुए) मुझे पता ही है, एक्सपीरियंस्ड(अनुभवी) हूँ|
(सब हँसते हैं)
अभी पूछा जाए तो जो कम-से-कम संख्या आएगी यहाँ पर, वो होगी तीन हज़ार के आसपास| और जो ज़्यादा-से-ज़्यादा आयेगा, वो होगा आठ-दस हज़ार के आसपास| अब किसी महीने में बहुत ज्यादा कर दो तो अलग बात है, वरना इतना ही होगा। ठीक बोला?
(सभी हामी में सर हिलाते हैं)
तो औसतन, यह जो यहाँ पर ग्रुप बैठा है, वो महीने का क़रीब पाँच हज़ार खर्च करता होगा, इससे ज्यादा नहीं| इतना ही करता है ना?
इंजीनियरिंग के आख़िरी साल के मई महीने तक भी तो इतने ही खर्च करते रहोगे| या इससे थोडा बढ़ाकर छः हज़ार कर दोगे? ये ऐसा ही रहेगा ना?
