नीहारधूमार्कानलानिलानां खद्योतविद्युतस्फटिकशशिनाम्। एतानिरूपाणिपुरःसराणि ब्रह्माण्यभिव्यक्तिक राणि योगे॥
योग साधना प्रारम्भ करने पर ब्रह्म की अभिव्यक्ति स्वरुप सर्वप्रथम कुहरा, धुआँ, सूर्य, वायु, जुगनू, विद्युत्, स्फटिकमणि, चन्द्रमा आदि बहुत से रूप साधक के समक्ष प्रकट होते हैं।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय २, श्लोक ११)
आचार्य प्रशांत: योग की दृष्टि से कैसे पढ़ें इसको? कि जब आप ध्यान में बैठते हैं तो मन में किस प्रकार के आकार आने लग जाते हैं। आप आँख बंद करके बैठे, आँखों के आगे कोई तारा नाच गया, आँखों के आगे प्रकाश का एक बड़ा सा पुंज खड़ा हो गया सूरज जैसा, या छोटे-छोटे प्रकाश के बिंदु झिलमिलाने लगे जुगनू जैसे, या कि सब कुछ धुआँ-धुआँ सा हो गया कोहरे जैसा।
इस तरह के अनुभव ध्यान के अभ्यासी अकसर बताया करते हैं। और योग में बात यहीं पर ख़त्म हो जाती है। योग कहता है इस तरह का कोई अनुभव आपको हो रहा है, तो इसका मतलब ये है कि आप ध्यान के पहले चरण में हैं, आगे बढ़िए, लक्षण शुभ है।
वेदांत की दृष्टि से इनका अर्थ दूसरा है, गहरा है। आज तक आप वही देखते थे और अनुभव करते थे जो आपकी जागृत अवस्था की चेतना आपको दिखाती थी। ठीक है? उसके अलावा आपके अनुसार और कुछ है ही नहीं। उदाहरण के लिए आपसे पूछा जाए कि, 'आपकी दुनिया में क्या है?' तो आप कहेंगे 'मेरी दुनिया में मेरा परिवार है, मेरी नौकरी है, मेरा घर है, मेरा अतीत है, मेरे सपने हैं, और मैं समझता हूँ यही है मेरी दुनिया।' और आपको पूरा विश्वास भी होगा कि आपकी दुनिया इतनी ही है।

