सोना सज्जन साधु जन, टूट जुड़े सौ बार।
दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, एकै धक्का दरार।।
~ संत कबीर ~
आचार्य प्रशांत: “सोना सज्जन साधु जन, टूट जुड़े सौ बार”। पेड़ जब हरा होता है, आप पत्ता तोड़ते जाइए, नए पत्ते आते जाएंगे। उसकी अपनी एक प्राण शक्ति है जिससे हज़ार पत्ते पैदा हो जाने हैं। क्यों होता है पेड़ हरा? क्योंकि उसके पास मूल है। मूल शब्द ही बड़ा मज़ेदार है। मूल माने जड़ और मूल माने वो भी जो असली है; जो प्रथम है; जो स्रोत है; जो ओरिजिन है; वो भी मूल है; वो ही मूल है। जब तक पौधा उस स्रोत से समप्र्क्त है, आप तोड़ते जाओ पत्तियाँ, पत्तियाँ आती जाएंगी। वो पत्तियाँ उस पौधे की है ही नहीं। पौधा तो टूट गया था। आप चाहते तो उस पौधे को छितर-बितर कर सकते थे, पूरी तरह काट सकते थे। पौधा तो टूट गया था; फिर आ कहाँ से गया दोबारा? अगर पत्तियाँ उस पौधे की होतीं तो पौधे के न रहने पर दोबारा कहाँ से आ गयीं? पत्तियाँ मूल की हैं। पत्त्तियों को वो भेज रहा है जो स्रोत है, जो असली है, जो मौलिक है।
और जब तक पौधा ‘उससे’ जुड़ा हुआ है तब तक पौधे को चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। एक नहीं सौ पत्ती टूटें; पत्ती क्या, टहनी टूटे; टहनी क्या तुम पौधे को ऊपर-ऊपर से काट भी दो, तो भी नई कोपलें फूटेंगी। किसी न किसी रूप में फूटेंगी – दाएं-बाएं, आड़े-तिड़छे, थोड़ी बहुत, वापिस आएंगी ज़रूर। वो पौधे की नहीं हैं; पौधे को ये गुमान न हो जाए कि ‘मैं’ वापिस आया हूँ। वो तो मूल है जो अपनेआप को प्रकट कर रहा है; वो तो जड़े हैं जो दोबारा अपनेआप को प्रकट कर रही हैं।






