प्रश्न: आचार्य जी, अपने आप को इस दिशा में ले जाना; आपने तो कहा इस चीज़ का अनुशरण करो, लेकिन मैं ये समझता हूँ, ये आसान काम नहीं है।
श्रोता: कोशिश करो।
प्रश्नकर्ता: नहीं, कोशिश अलग चीज़ है।
कौन चाहता है बुरा बनना? कोई नहीं चाहता है बुरा बनना। विरला कोई होगा जो बोले, “नहीं, मैं खराब हूँ। खराब बनना चाहता हूँ।” हर आदमी चाहता है कि वो अच्छा करे, उसको लोग पसंद करें, उसकी अच्छाईयों को। लेकिन उस रास्ते पर, मुझे लगता है नब्बे प्रतिशत लोग चल नहीं पाते हैं। मुझे लगता है कि हम किसी वजह से लाचार हैं।
तो मैं ये चाहता हूँ कि आप बताएँ कि हम रास्ते पर कैसे अपने को धीरे-धीरे ले के आएँ? ये कोई रात भर में तो होगा नहीं, जादू तो है नहीं कि आपने बोल दिया, और हमने कर दिया, और कल से हो गया। ये नहीं होने वाला। अनुशाषण से लाना है, कैसे लाना है? छोटे-छोटे कदम – जैसा आपने बोला।
आचार्य प्रशांत: आपने कहा, “नब्बे प्रतिशत लोग कर नहीं पाते, चाहते हुए भी।”
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