प्रश्न: आचार्य जी, प्रणाम! अभी तक जितना जीवन जिया, सब भौतिक वस्तुएँ एकत्रित करने में बिता दिया। आपके वीडियोज़ सुनने शुरु किए आठ-नौ महीने से, तो झूठ दिखता है कि कितना बेहोशी वाला जीवन जिया है। फ़िर, कहीं-न-कहीं उनका आकर्षण बना रहता है। जब परिवार में अपने परिवारजनों को देखते हैं, तो वो सारी भौतिकता अपनी ओर आकर्षित करती है, दबाव डालती है।
आचार्य प्रशांत जी: पदार्थ तो बढ़िया चीज़ है ही। उसमें क्या बुराई है?
पदार्थ में, चीज़ों में, वस्तुओं में, बुराई क्या हो गई? पर समझ लेना कि उसमें अच्छाई भी कब है। उसमें अच्छाई भी तब है, जब वो तुम्हारे काम आए। जब वो तुम्हारे काम आए।
एक सज्जन को देखा मैंने, वो अपनी एक बहुत बड़ी गाड़ी, जो उन्होंने नई-नई ही खरीदी थी, महंगी गाड़ी, एक -तिहाई दाम में बेच रहे थे। तो किसी ने बताया कि इस नई गाड़ी में इनके जवान बेटे की मौत हो गई थी। तो इस गाड़ी को वो किसी भी तरीक़े से अपनी नज़रों से हटाना चाहते हैं।
गाड़ी, शानदार। चालीस-पचास लाख की गाड़ी। मस्त गाड़ी, वो भी नई। और वो उसको देखना भी नहीं चाहते थे। कह रहे थे, “हटाओ सामने से, आग लगा दो। कोई नहीं खरीदता हो तो, कबाड़ में दे दो।” घर में भी नहीं रखते थे। किसी और को दे रखी थी – “अपने पास रखो, बिकती हो तो बेचो, नहीं तो इसको काटने भेज दो।”
क्यों? पदार्थ ही तो था। कितना शानदार पदार्थ था। इतना शानदार पदार्थ था, इतना महँगा पदार्थ था। पदार्थ ही तो है न? गाड़ी क्या है? पदार्थ है न गाड़ी। वो उसको क्यों देखना भी नहीं चाहते थे? क्योंकि काम नहीं आई। बल्कि काम बिगाड़ गई।

