भगवती महामाया – दुःख की स्रोत भी और मुक्ति दायिनी भी || दुर्गासप्तशती पर (2021)

आचार्य प्रशांत: तो ऋषि मारकंडेय हैं मार्कंडेय पुराण में और वे अपने शिष्यों को दीक्षा दे रहे हैं, सुना रहे हैं, समझा रहे हैं। और शिष्यों में कौन हैं? पक्षी हैं। तो ऐसा ही है, भाई। पुरुष प्रकृति को कुछ कह रहा है तो प्रकृति पक्षी का रूप लेकर भी तो हो सकती है न? तो उसी मार्कंडेय पुराण से दुर्गा सप्तशती का प्रादुर्भाव है। तेरह अध्याय हैं सप्तशती में। नाम से ही स्पष्ट है कि सात सौ श्लोक होंगे। और जो तेरह अध्याय हैं, ये तीन चरित्रों में बांटे जा सकते हैं।
जो तीन चरित्र हैं, वो तीन तरह के अज्ञान और दंभ, और मद और मोहरूपी राक्षसों को केंद्र में रखकर हैं। जो पहला चरित्र है, उसमें सिर्फ़ पहला अध्याय आएगा। उसमें मधु और कैटभ का संहार होता है। जो दूसरा चरित्र है, उसमें अध्याय क्रमांक दो से चार तक आते हैं, जिसमें महिषासुर का संहार होता है। और फिर जो तीसरा चरित्र है, उसमें पाँचवे अध्याय से लेकर के तेरहवें अध्याय तक सम्मिलित होते हैं, जिसमें शुंभ निशुंभ का संहार होता है। ठीक है?
और संहार करने वाली भी जो तीन देवियाँ हैं, वो वास्तव में महाप्रकृति के तीन गुणों का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रथम चरित्र में तमोगुणी महाकाली हैं, दूसरे चरित्र में रजोगुणी महालक्ष्मी हैं और तीसरे चरित्र में सतोगुणी महा सरस्वती हैं। ठीक है?
देशभर में जो आप देवी का रूप आम तौर पर देखते हैं, वो महिषासुरमर्दिनी के रूप में हैं। वह दूसरे चरित्र से आता है। तो तेरह अध्यायों वाली दुर्गा सप्तशती में जो दूसरा चरित्र है, उसकी सबसे ज़्यादा मान्यता और महत्व है। यहाँ तक भी होता है कि अगर आपको सप्तशती का पाठ करना है और किसी कारणवश आप तीनों चरित्रों और तेरह अध्यायों का पाठ नहीं कर सकते तो मान्यता है कि सिर्फ़ दूसरे चरित्र का पाठ कर लो तो भी सुफल उपलब्ध हो जाएगा। लेकिन मात्र पहले या तीसरे चरित्र का पाठ करने को वैध नहीं माना जाता। महालक्ष्मी का ही वो रूप जिसमें वो महिषासुर वध करती हैं, दुर्गा कहलाती हैं। वहीं से इस ग्रंथ का नाम भी है।
तो राजा सुरथ हैं। वे बड़े न्याय प्रिय राजा थे। और उनकी जो दंड नीति है, सप्तशती कहती हैं कि बड़ी प्रबल थी। प्रजा के शुभेच्छु थे, जन-कल्याण में सदा उत्सुक रहते थे, और बड़ा उनका राज्य था। लेकिन समय की मार, कोला विध्वंसी नामक एक समुदाय उनका शत्रु हो गया और इन शत्रुओं ने कम संख्या होते हुए भी राजा सुरथ को युद्ध में हरा दिया, राज्य का बड़ा हिस्सा छीन लिया उनसे। तो राजा सुरथ वापस अपनी राजधानी में आ गए। जब राजधानी में आते हैं वापस तो वहाँ पाते हैं कि उनको अब दुर्बल जान करके उनके ही मंत्रियों इत्यादि ने उनके विरुद्ध षड्यंत्र कर रखे हैं। बाहर वे हारे शत्रुओं से, और ऐसे शत्रुओं से हारे जिनकी संख्या भी कुछ कम ही थी राजा की सेना की अपेक्षा।
