आचार्य प्रशांत: पंचतंत्र में एक कहानी आती है, छोटी-सी, सरल, साधारण, उसको आधार बनाकर प्रश्न पूछा है। कहानी है बंदर और मगरमच्छ की। कहानी कहती है कि एक जामुन के पेड़ पर नदी किनारे बंदर रहता था। बंदर को नाम भी दे दिया गया है, ‘रक्तमुख’। लाल-लाल मुँह था न, तो उसको क्या नाम दे दिया गया है? रक्तमुख।
नदी से निकलकर, वहाँ पेड़ के नीचे कभी-कभार एक मगरमच्छ आ जाया करे। मगरमच्छ को नाम दिया गया है, ‘करालमुख’। कराल—भयानक—विकराल होता है न? करालमुख। तो बंदर देखे, मगरमच्छ नीचे आकर बैठा हुआ है, तो उसको ऊपर से वो कुछ मीठे जामुन फेंक दिया करे। मगरमच्छ बड़ा प्रसन्न, कहे, “बढ़िया है, मीठे जामुन।” तो ऐसे दोनों की दोस्ती हो गई।
बातचीत आगे बढ़ने लगी। एक-दूसरे को अपनी बातें भी बताने लगे। तो बंदर जो फेंका करे जामुन, तो उसमें से कुछ जामुन मगरमच्छ बचा ले और वो ले जाए और वो अपनी पत्नी को दिया करे। पत्नी अपना जामुन खाए। अब पत्नी को क्या लेना-देना बंदर से, उसको तो... जामुन ही मीठे, बढ़िया जामुन।
तो एक दिन पत्नी को ख़्याल आया, बोली, "जो बंदर रोज़ इतने मीठे जामुन खाता है, उसका कलेजा कितना मीठा हो गया होगा। हम तो दो-चार ऐसे मीठे जामुन पाते हैं। वो बंदर तो रहता ही जामुन के पेड़ पर है, मीठे-मीठे जामुन खाता है। उसका कलेजा कितना मीठा हो गया होगा!" तो मगर को बोलती है, "ऐसा करो, वो बंदर ही ले आओ। उसका कलेजा खाना है, बड़ा मीठा होगा। ये जामुन क्या लेकर आते हो? बंदर का मीठा कलेजा खाना है।"
तो मगरमच्छ बोलता है, "तू पगला गई है? दोस्त है मेरा। मुझ पर विश्वास करता है। मुझे जामुन खिलाता है। तेरे लिए भी मैं ले आया। तू कहती है कि उसका कलेजा खाना है!"
पत्नी बोली, "मैं समझ गई, वो वानर है ही नहीं, कोई वानरी ही है।" और फिर बड़े विस्तार में पत्नी ने जो तर्क दिए, पंचतंत्र में उनका उल्लेख आता है। बोलती है, "मैं समझ गई कि क्यों तुम्हें आजकल रात में नींद नहीं आती, क्यों मुझमें तुम रुचि कम दिखाते हो। वो वानर है ही नहीं, वो वानरी है। तभी तुम वहाँ इतना समय बिताते हो। तभी वो तुमको इतने मीठे जामुन देती है। और तभी तुम इंकार कर रहे हो कि उसको मारोगे नहीं।"


