बाज़ी ले गए कुत्ते! || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2014)

आचार्य प्रशांत: पूरी प्रकृति में आदमी अकेला है जो भटक गया है। और सब जितने भी हैं, वो अपने घर में हैं। वो वहीं हैं, जहाँ उन्हें होना था। वो अपने घर से कभी बाहर निकले ही नहीं।
चारों और देखोगे तो पाओगे कि हर तरफ एक निर्विकल्पता है। अगर सतही तौर पर देखोगे तो निर्विकल्पता बस इतनी सी है कि आदमी के अलावा और कुछ भी सोचता नहीं है। कुछ पाने के लिए आतुर नहीं है, कुछ बन जाना नहीं चाहता। रेत हो चाहे पेड़ हो, चाहे जानवर हो, उसे कुछ बन नहीं जाना है। सतही तौर पर निर्विकल्पता बस इतनी ही दिखाई देगी। क्या? कि कुत्ता पैदा होता है कुत्ता, और कुत्ता ही मर जाता है। कुछ और होने का विकल्प, ऑप्शन, उसके पास होता ही नहीं है। ठीक है?
मैं कह रहा हूँ, ये बात सिर्फ सतही है। गलत नहीं है, सतही है।
बात असली ये है, कि इस निर्विकल्पता के पीछे एक अचिन्तय श्रद्धा है। एक ऐसी श्रद्धा जिसको सोचा भी नहीं गया, पर है। ये निर्विकल्पता यूँ ही नहीं आ गयी है, अनायास नहीं है, इत्तफाकन नहीं है। कुत्ता यदि कुत्ता है, और उसे कुछ और नहीं हो जाना, तो ये बात सांयोगिक नहीं है। लगती सांयोगिक है। आपसे पूछा जाए कि कुत्ते की कोई आकांक्षाएँ क्यों नहीं हैं, कुत्ता कुछ बन क्यों नहीं जाना चाहता, कुत्ता कुछ अर्जित क्यों नहीं कर लेना चाहता? तो आप कहोगे कि वो इसीलिए है क्योंकि कुत्ते के पास दिमाग ही नहीं है। क्योंकि उसके पास दिमाग नहीं है, तो वो अपने कुत्ते होने से ही संतुष्ट है। उसको बस दो जून की रोटी मिलती रहे, उसका काम चलता रहेगा। उसे, और कुछ नहीं चाहिए।
मैं कह रहा हूँ, बात इससे कहीं आगे की है। दिखती इतनी सी है कि कुत्ते को कुछ चाहिए नहीं। सच तो ये है कि इसके पीछे एक गहरी से गहरी श्रद्धा है जो पूरी प्रकृति में फैली हुई है। जो उस आदमी को उपलब्ध नहीं है, बाकी हर जगह है। आम दृष्टि कहेगी, “कुत्ते के पास दिमाग नहीं है इसीलिए श्रद्धा है। और मैं कह रहा हूँ अभी कि कुत्ता हो या पेड़-पौधा हो, उनकी रग रग में श्रद्धा ही बहती है। वो कोई सोची विचारी श्रद्धा नहीं है। वो तर्क विचार से आई हुई श्रद्धा नहीं है, वो बस है। एक सुकून है, जैसे कोई बच्चा अपनी माँ की गोद में हो। एक शान्ति है, जैसे कुछ छिन नहीं जाना है, कुछ पा नहीं लेना है। एक स्थिरता है, स्थायित्व है, जैसे कि तुम अपने ही घर में हो। और ये प्रकृति में सबको उपलब्ध है।

