बाहर की चूड़ी ही हटाएँगी, या भीतर की हथकड़ी भी? || (2020)

आचार्य प्रशांत: मैं तो सब समाप्त करके सोने ही चला गया था, फिर एक, दो, तीन संदेश आने लगे कि "आचार्य जी, बहुत लोग आज के एक मुद्दे पर सवाल पूछ रहे हैं, कुछ बोलिए।" तो मैंने मुद्दा देखा और फिर उठकर आ गया हूँ बोलने।
मुद्दा क्या है?
मुद्दा ये है कि कुछ दिनों पहले गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने एक फैसला दिया है जिसमें कहा है कि अगर विवाहिता स्त्री सिंदूर, चूड़ियाँ, मंगलसूत्र वगैरह धारण नहीं कर रही, तो ये पर्याप्त कारण है कि इसके आधार पर पति की तलाक की अर्ज़ी स्वीकार कर ली जाए।
और न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में 'क्रूरता' शब्द का कहीं पर प्रयोग कर दिया है। कहा है कि अगर स्त्री ऐसा कर रही है तो ये पति के प्रति क्रूरता है।
तो उसके बाद से दो पक्ष हैं, उनमें घमासान मचा हुआ है। एक पक्ष वो है जो कह रहा है कि "हाँ, बिलकुल आवश्यक है कि विवाहिता इन सब प्रतीकों को निश्चित रूप से धारण करे।" और दूसरा पक्ष, जिसमें अधिकांश स्त्रियाँ ही हैं, वो अपनी तस्वीरें डाल रही हैं सोशल मीडिया पर जिसमें उन्होंनें चूड़ी, सिंदूर वगैरह कुछ नहीं पहन रखा है और कह रही हैं कि कोई ज़रूरत ही नहीं है।
न्यायालय पर भी मौखिक रूप से सोशल मीडिया पर काफी आक्रमण किया जा रहा है। अभी एक-दो पोस्ट तो मैंने ऐसी देखी जहाँ पर स्त्रियाँ कह रही हैं कि "हमने तो विवाह भी बस संविधान पर हाथ रखकर किया था, हमें कोई धार्मिक प्रतीक चाहिए ही नहीं है। हमारे लिए संविधान ही काफी है।"


