आचार्य प्रशांत: आँखें जो होती हैं शरीर में, ये बड़ी आक्रामक होती हैं। ये भेदती हैं; टांग किधर को बढ़े उससे पहले आँख वहाँ जासूसी करके आई होती है। देखते हो न, आँख जिधर देखती है, कदम उधर को बढ़ते हैं?
आँख का काम ही है आक्रमण करना, सेंध लगाना और आँख जाती भी वहीं है, जहाँ मन उसको निर्देश देता है।
तुम अभी इधर को देख रहे हो, उधर को नहीं देख रहे हो, तो मन तुम्हें निर्देशित कर रहा है। जिधर को तुम्हारा मन लगा है, आँख उधर को जाती है। आँख कभी पूरा चित्र देखती नहीं, आँख तो मन की अनुचरी है। मन अगर गन्दा है, तो आँख लगातार क्या देखेगी? और फिर लोग कहते हैं, "आँखों देखी बात है", देख रहे हो संसार की मूर्खता? हम क्या बोलते हैं? हम बोलते हैं, "आँखों देखी बात हो, तभी यकीन करना।" मैं तुमसे कह रहा हूँ आँखों देखी है इसीलिए यकीन मत करना। क्योंकि देखी किसने? तुमने। और तुम देखोगे क्या? जो तुम्हारा मन कहेगा देखने को। तुम अपने सर के पीछे तो नहीं देख रहे। तुम मौजूद ही कहाँ पर हो? जहाँ तुम्हारा मन लाया। जहाँ तुम मौजूद भी हो, वहाँ तुम किस दिशा देख रहे हो, जहाँ तुम्हारा मन तुम्हें कह रहा है। फिर आँखों देखी बात की हैसियत क्या है? कानों सुनी की फिर भी थोड़ी ज़्यादा कीमत है क्योंकि कान फ़र्क नहीं कर पाता।
तुम कहीं बैठे हो, चारों तरफ़ से आवाज़ आ रही है तो कान में पड़ेगी ही। तो कान पर तो अपेक्षाकृत फिर भी थोड़ा भरोसा किया जा सकता है। आँख तो बड़ी धोखेबाज़ है, इसीलिए आँख बैठ कर के बंद की जाती है। समझ रहे हो कि क्यों योगी, संत ध्यान में बैठते हैं, तो आँखें बंद कर लेते हैं? और बंद कर भी नहीं लेते हैं, बंद हो ही जाती हैं। आँख कहीं को देखे, उसके लिए मन को उस विषय में रुचि होनी चाहिए। तुम्हारी अभी रुचि नहीं है पीछे की खिड़की में, तो उसको नहीं देख रहे हो। यहीं तुम्हें लगे कि अभी यहाँ से भागना है, भागने में तुम्हारी रुचि हो या तुम्हें कहीं पहुँचना है, तुम लगातार खिड़की और दरवाज़े की तरफ़ देखोगे। और जिसे कहीं को ना भागना हो, ना कहीं पहुँचना हो, वो किधर को देखे? उसके लिए तो देखना व्यर्थ ही है, तो उसकी आँखें अपने आप बंद हो जाती हैं।

