प्रश्न: आजकल यूट्यूब और आम ज़िन्दगी में गालीगलौज इतनी क्यों बढ़ गई है? कारण क्या है? अभी यूट्यूब और टिकटॉक पर पिछले कुछ दिनों से एक वीडियो वायरल हो रहा है जो गालियों से ही भरपूर है, उसमें और कोई मुद्दे की बात की नहीं गई है।
आचार्य प्रशांत: बेटा, गालियाँ एक तरह की बातचीत होती हैं - कम्युनिकेशन (संप्रेषण)। गालियाँ बढ़ गईं हैं उनको नैतिकता के ही तल पर मत देखो, गालियाँ भी बात करने का एक तरीक़ा हैं।
कई तल होते हैं बात करने के ना? दूसरे से संवाद करने के, संपर्क करने के, वार्ता करने के कई तरीक़े होते हैं। और ये तरीक़े दो चीज़ों पर निर्भर करते हैं - तुम कैसे हो, और वो दूसरा व्यक्ति कैसा है।
ऊँचे-से-ऊँचे तरीक़ा तो मौन भी बताया गया है कि - कुछ बोलो नहीं, तो भी बातचीत हो जाती है। फिर एक तरीक़ा होता है स्पर्श का, कि कई बार बस किसी को ज़रा-सा ऐसे इशारा कर दो, या छू दो इतना-सा, इतने से उसको पता चल जाता है कि कहना क्या चाहते हो। फिर एक तरीक़ा होता है भाषा का, और फिर एक तरीक़ा होता है ध्वनि का।
तो तुम किस तरीक़े से अपनी बात दूसरे तक संप्रेषित करते हो, वो इस पर निर्भर करता है कि तुम कौन हो, और दूसरे को क्या समझ रहे हो।
अब ऐसे समझो, दो उदाहरण देता हूँ।
मान लो तुम गधे हो। अब तुम्हें किसी इंसान से कोई भी बात करनी है, तो कैसे करोगे? कोई भी बात करनी है, तो कैसे करोगे? रेंककर ही तो करोगे? - ढेंचू-ढेंचू, क्योंकि तुम्हारे पास कोई विकल्प ही नहीं है। तुम गधे को यह थोड़ी बोलोगे कि - "तू ढेंचू-ढेंचू क्यों बोल रहा है?" क्योंकि वो गधा है, उसे और कुछ आता नहीं, तो वो 'ढेंचू-ढेंचू' बोल रहा है। उसे जो कुछ भी बोलना है, वो 'ढेंचू' की ही भाषा में बोलेगा।



