वक्ता: सम्मान वो नहीं है, जो हम समझते हैं। वो डर बस है। सम्मान के नाम पर हम डरे रहते हैं कि अगर किसी का सम्मान करते हो, तो उसके सामने मुँह न खोलो। वो डर बस है। सम्मान शब्द का अर्थ भी बस इतना ही होता है: ठीक से देखना।
श्रोता: सर, बार-बार एनालाईज़ करना; किसी चीज़ को बार-बार एनालाईज़ करो।
वक्ता: हाँ, हाँ। बार-बार समझना, ध्यान से देखते रहना। सम्मान का भी वही अर्थ होता है: सम्यक रूप से मानना। पहले जानना, फिर मानना। सम्मान का वो थोड़ी अर्थ है कि कोई कुछ बोल रहा है, चुप-चाप मान लिया। यह किसने पट्टी पढ़ा दी? और यह पट्टी पाँच साल के बच्चे को पढ़ाई जा सकती है। पैंतिस साल का आदमी भी अभी क्यों माने बैठा है? सम्मान जैसा ये, सम्मान जो है यह बड़ा नकली शब्द है। बड़ा अस्वाभाविक शब्द है; प्रेम स्वाभाविक है।
सम्मान में कुछ भी स्वाभाविक नहीं है। सम्मान मानव रचित चीज़ है। सम्मान पूरी तरीके से आदमी के दिमाग की उपज है। ठीक वैसे ही, जैसे फियर आदमी के दिमाग में बैठता है; वैसे ही सम्मान भी वहाँ बैठती है। प्रेम दिमाग से बाहर की है। प्रेम आपके दिमाग की उपज नहीं होती। प्रेम आपकी अपनी शांत, साफ़ अवस्था है। सम्मान बाहर से ओढ़ी हुई चीज़ है पर होता यही है न? बचपन से ही यह थोड़ी कहा जाता है कि आप किसी को लिख रहे हो, तो उसमें लिखो, ‘*योर्स लविंग्ली‘* ‘*योर्स रेस्पेक्टफुल्ली‘* और यह सब चलते रहता है। वो कुछ नहीं है। वो सिर्फ़ व्यवस्था बनाये रखने की बाते हैं। वो व्यवस्था बनाए रखने की बाते हैं कि, ‘’मैं तुम्हारे सामने झुक रहा हूँ। मैं तुम्हारे सामने झुक रहा हूँ और आप जिसको *‘योर्स रेस्पेक्टफुल्ली‘* लिखते हैं, उसका अहंकार एकदम और घना होगा। हाँ! मुझे रेस्पेक्ट मिल रही है! आप किसी को प्रेम करें, उसमें उसका अहंकार बहुत नहीं बढ़ पाएगा। खासतौर पर, अगर वो कोई बहुत ऊँचें किस्म का आदमी है उसको आप लिख दें, ‘योर्स लविंग्ली‘ तो-तो गुस्सा और आ जाएगा, ‘तू होता कौन है मुझसे लव करने वाला?’

