प्रश्नकर्ता : आचार्य जी, क्या जीवन में इच्छाएँ होनी चाहिए या नहीं?
आचार्य प्रशांत: अपने स्वभाव में तुम स्थित हो जाओ, ये इच्छा बुरी नहीं है। 'इच्छा', 'इच्छा' में फर्क होता है। 'अपेक्षा', 'अपेक्षा' में फर्क होता है। तुम कहो कि तुम्हें बोझमुक्त जीना है, हल्का जीना है, आनदिंत जीना है, ये इच्छा बुरी नहीं है। वास्तव में अध्यात्म में प्रवेश करने के लिए भी, मुमुक्षा तो चाहिए-ही-चाहिए। और मुमुक्षा माने क्या? मोक्ष की इच्छा। बिना इच्छा के तो काम चलेगा ही नहीं। सवाल ये है कि तुम्हारी इच्छा क्या है?
कद्दू की इच्छा और 'सत्य' की इच्छा में फर्क होता है न, कि नहीं होता? क्या चाह रहे हो — जो चाहने लायक है, उसको चाहो। उसको चाहो न जो तुम्हारी बेचैनी मिटा दे। जिसको चाहने के बाद बार-बार चाहते ही रहने की ज़रूरत न पड़े।
प्र: आचार्य जी, परिवार सत्संग में जाने का विरोध करता है, क्या करूँ ?
आचार्य: कितने साल की हो?
(प्रश्नकर्ता हिचकिचाती हैं)
अब उम्र बताने में लाज आती है।


