प्रश्नकर्ता: प्रकृति हमें क्या सिखाती है?
आचार्य प्रशांत: कुछ सिखाती नहीं है, बस है। आप प्रकृति की बात कर रहे हैं। प्रकृति से तो यही जान लीजिए कि आपके भीतर जो प्रकृति बैठी है, वो बिलकुल वैसी ही है जैसे ये पेड़-पौधे, जानवर।
प्र: प्रकृति कितनी स्थिर और शांत लगती है।
आचार्य: दो बातें हैं देखने लायक। एक तो ये कि किस सीमा तक इनमें शान्ति है, और दूसरी बात ये कि कैसे इनकी शान्ति की सीमा है। आपका शरीर और किसी पेड़ का शरीर और किसी जानवर का शरीर बहुत हद तक एक जैसा है। तो आपके शरीर की माँगें, शरीर की वृत्तियाँ भी वही हैं जो किसी जानवर की हैं। इस बात को भूलना नहीं चाहिए।
चाहे वो कुत्ता हो जो भौंक रहा हो, या चाहे एक आदमी हो जो इस बात पर नाराज़ हो रहा हो कि उसके क्षेत्र में कोई और क्यों घुस आया, इन दोनों में कोई बहुत अंतर नहीं है।
(एक कुत्ता भौंकता है)
अभी आपने बोला था कि आपको प्रकृति शांत नज़र आती है, तो ये कुत्ता क्यों भौंका? तो शान्ति कहाँ गई? ये सब बड़े रूमानी ख्याल हैं कि प्रकृति में शान्ति है और ये है और वो है। मुझे बताइए न वो कुत्ता क्यों भौंका? वो प्रकृति ही तो है। और व्यर्थ भौंका। यहाँ कोई उसका अहित नहीं करने जा रहा था लेकिन फिर भी उसने अपना भी माथा ख़राब किया, शोर मचाया और जो लोग आस-पास हैं उनको भी परेशान किया।


