प्रश्नकर्ता: सर, आपने पहले कहा था कि एक शुद्ध मन के लिए हमें कुछ करना चाहिए। जैसे हम लोग दफ़्तर जाते हैं, समझौता करते हैं, और कम्पनी के लिए झूठ भी बोलते हैं, अपने काम करने के लिए पता नहीं क्या-क्या करते हैं। यह सब करते भी हैं और इससे हटना भी चाहते हैं। शायद यही ही है, पर फिर शुद्धता कैसे आए जीवन में?
आचार्य प्रशांत: है, प्रारब्ध है। ठीक है, करो।
(श्रोतागण हँसते हैं)
फिर समस्या क्या है? फिर सवाल क्यों है? जाओ रोज़ दफ़्तर, कौन रोक रहा है? फिर सवाल क्यों है?
प्र: सर, शुद्धता कैसे लाएँ?
आचार्य: मत लाओ शुद्धता! मैंने यूँ ही बोल दिया, भूल जाओ। कोई ज़बरदस्ती ही है क्या कि शुद्धता लानी ही है, सफाई करनी ही है? खुश हो अगर जो चल रहा है उससे, तो चलने दो न उसको। एक तरफ़ तो ख़ुद ही कहते हो कि, "नहीं-नहीं जान जा रही है, बड़े परेशान हैं", दूसरी ओर ये भी कहते हो कि, "बदलेंगे नहीं।" तो पहले तय कर लो - परेशान हो, या बदलना है? तय कर लो।
"दफ़्तर जाते हैं। वहाँ सारे गलीच काम करने पड़ते हैं - झूठ बोलना पड़ता है, हिंसा करनी पड़ती है। लेकिन देखिए, उससे तनख्वाह मिलती है, और इज्ज़त मिलती है।"



