प्रश्नकर्ता: मैं एक घरेलू महिला हूॅं और दिनभर काम करते वक़्त दिमाग में विचार घूमते रहते हैं, इन पर काबू कैसे करें?
आचार्य प्रशांत: कभी भी ये ना कहिएगा कि मेरे विचार मेरे विचार है। बंदर को याद रखियेगा। आपके विचार आपके विचार नहीं है। आपको जो चाहो वो सुचवाया जा सकता है तुरंत। सारे विचार वातावरण के कारण पैदा हो जाते हैं, आप सोचते हैं मेरा है। आपका है ही नहीं और आप उसके पीछे-पीछे चल देते हैं। विचार आया, "चलो, चाट खाएं", चल दिए। ये समझ में ही नहीं आया कि चाट खाने का विचार ही इसलिए आया क्योंकि चाट की खुशबू नथुनों में पड़ी।
चाट वाला भी होशियार होता है। वो आवाज करता है टन-टन-टन, सुना है? और अपने तवे पर घी डालेगा, और उसमें से गंध उठेगी, आपकी नाक में पड़ेगी, और आपको विचार आ जाएगा कि चाट खाना है। आप कहते हो, "ये तो मेरा विचार है"। आपका विचार थोड़े ही है। वो विचार किसका है वास्तव में? वो चाट वाले का है। चाट वाला होशियार है, आप बुद्धू बन गए। और कोई आपको रोके कि चाट नहीं खानी, तो आपको बहुत क्रोध आ जाएगा। आप कहोगे, "मेरा विचार था, और तुम मेरे विचार में बाधा बन रहे हो"। आप समझे ही नहीं कि आपका विचार आपका है ही नहीं। दुनिया आपकी मालिक बन गई है, आप गुलाम हैं।
सारे विचार ऐसे ही होते हैं। सारी भावनाएं ऐसी ही होती हैं। अभी आपने विचारों पर प्रयोग किया था, अब भावनाओं पर प्रयोग करना चाहेंगे? जिन घटनाओं को आप अपने जीवन की सुंदर घटनाएं बोलते हैं, ज़रा 15-20 सेकंड उनका स्मरण करिए। जो आपके जीवन की सबसे तथाकथित खुशनुमा घटनाएं हैं या कि जो सबसे ज़्यादा गौरवशाली घटनाएं हैं, उनका स्मरण करिये।
मन कैसा हो गया? प्रसन्न हो गया। आप भली-भांति जानते हो कि आप खुद चेष्ठा करके किसी सुखदाई घटना को याद कर रहे हो लेकिन अपनी ही चेष्ठा से मन की भावना आहाहा हो गई। अब आपके जीवन में जो सबसे दुख के क्षण रहे हो, उनको याद कर लीजिए।




