वक्ता: पहला हिस्सा है सवाल का कि हम वही सब कुछ तो जानते हैं जो हमें बचपन से अब तक बताया गया है। और दूसरा हिस्सा है, कि अगर यह सब ना हो तो होगा क्या?
अंकित, पहली बात यह कि जो कंडीशनिंग है तुम्हारी वह दो माध्यमों से होती है।
पहला, फिजिकल (शारीरिक)दूसरा, सोशल (सामाजिक)
जिसको तुम अपना जन्म कह रहे हो उसके बाद सिर्फ और सिर्फ सोशल कंडीशनिंग ही होती है। फिजिकल तो पहले से चली आ रही है। वह तुम्हारे DNA में बैठी है। एक छोटा बच्चा भी पूरी तरह खाली स्लेट नहीं होता। छोटा बच्चा भी रौशनी को जानता है कि रौशनी है। उसको भी रौशनी और अँधेरे में अंतर दिख रहा है ना? मतलब वह भी कंडिशन्ड है। वह कंडीशनिंग लाखों सालों से चली आ रही है। यह विकास प्रक्रिया का नतीजा है। तो पहली बात तो यह कि हम खाली स्लेट कभी हैं ही नहीं।दूसरी बात यह कि वह नॉलेज और फीडिंग जो होती है वह ना हो तो होगा क्या? हो ही नहीं सकता के ना हो। क्योंकि पूरी फीडिंग बाहर से होती है और तुम जहां कहीं भी जाओगे एक बाहर हमेशा मौजूद रहेगा। तुम इस हॉल में नहीं बैठोगे तो कहीं और जाओगे। जहाँ भी जाओगे एक बाहरी हमेशा मौजूद रहेगा। और वह अपना प्रभाव तुम पर छोड़कर रहेगा। तुम किसी पहाड़ की चोटी पर भी जाओगे तो वहाँ पर भी कुछ न कुछ बाहरी बना ही हुआ है। लगातार बना हुआ है। तो इसलिए फ़र्क़ नहीं पड़ता कि तुम यहाँ हो कि कहाँ हो। बाहरी तुमको लगातार मिल ही रहा है।
यह विचार कि अगर मैं किसी ख़ास परिस्थिति में हूँ तो मैं इन्सुलेट हो जाउंगा, यह हो नहीं सकता और ना उसकी कोई क़ीमत है। यह जो बाहरी प्रभाव है यह हमारे काम का है। यह हमारे काम का है एक ख़ास उम्र तक। एक उम्र तक तो हमें इस पर निर्भर ही रहना पड़ेगा। क्योंकि मस्तिष्क अभी विकसित नहीं हुआ है। तब तक तो तुम्हे दूसरे पर निर्भर करना ही पड़ेगा। कोई और ही होगा जो तुम्हे आकर बताएगा कि इस सॉकेट में ऊँगली मत डालो, सड़क पर किस तरफ चलो। तुम यह ज्ञान लेकर पैदा नहीं होते। और अगर यह सोचा जाए कि अपने अनुभव से सीखोगे, तो तुम बहुत छोटे हो। तो एक ख़ास उम्र तक ज़रूरी भी है कि तुम बाहर की परिस्थितियों के गुलाम बनके ही रहो, तुम्हे रहना ही पड़ेगा, यह एक अनिवार्यता है।


