प्रश्नकर्ता: आपकी वीडियो (चलचित्र) लगातार सुनने के बाद एक बात जो मेरी समझ में उतरी है वो ये है कि हमें हर वक़्त पता होता है कि सही कर्म क्या है, और उसके बावजूद भी जो ग़लत कर्म होता है उसका चुनाव हम अक्सर कर लेते हैं। आचार्य जी, मेरे अनुभव में ये है कि जब मैं लगातार ग़लत कर्म कर रहा होता हूँ, तो उसका एक बहाव होता है, उसकी अपनी एक ऊर्जा होती है, और उसमें बहुत सारी भावनाएँ जैसे अकेलापन, ऊब, ये सब मुझे महसूस ही नहीं होतीं। मैं हमेशा भारी और भीड़ के साथ एकजुट मालूम पाता हूँ अपने-आप को। पर जैसे ही मैं निर्णय बदलता हूँ, केंद्र बदलता हूँ और सत्कर्म में उतरता हूँ, तो ये सारे प्रेत मुझ पर हमला कर देते हैं। मुझे अकेला महसूस होने लग जाता है, ऊब होने लग जाती है, और हर तरीके से खाली महसूस करता हूँ। और फिर मैं दोबारा से उस खालीपन को भरने के लिए, जो ग़लत होता है उसके बहाव में टूट पड़ता हूँ। ये कुचक्र मुझे सालों से परेशान किए हुए है, कृपया मेरी मदद करें।
आचार्य प्रशांत: अगर तुम इस कुचक्र में फँसे ही रहना चाहते तो यहाँ ये प्रश्न नहीं लिख भेजते।
ये कुचक्र चल रहा है ये तो तुमने बता दिया। कुचक्र में दोनों ओर की ताक़तों का ब्योरा भी तुमने दे दिया, कि जब कोई ग़लत, घटिया काम कर रहे होते हो तो उसका एक बहाव होता है, एक गति, बल होता है, और लगता है ये काम चलता ही रहे। लेकिन जब कोई ढंग का काम करते हो तो दिमाग में भूत-प्रेत नाचने लगते हैं, कोई ढंग का काम तुम्हें करने नहीं देते। ये सब तुमने बता दिया, खूब विवरण दिया। ये नहीं बता रहे हो न, कि इन दोनों पक्षों में से तुम किस पक्ष के समर्थन में हो; वो बात तुम छुपा गए। इतना तो बता गए तुम कि कौरवों की सेना पांडवों की सेना से बहुत बड़ी है, ये नहीं बता रहे हो कि कृष्ण किधर हैं; वो मैं उद्घाटित कर दिए देता हूँ।
अगर तुम संतुष्ट ही होते घटिया काम में लिप्त रहने से, तो यहाँ ये सवाल क्यों भेजते भाई! इस सवाल की मौजूदगी क्या बता रही है हमें? कि घटिया काम में होगी बहुत ताक़त, और सही काम में होंगी बहुत अड़चनें, लेकिन चाहते तो तुम यही हो कि सही काम हो। तो इस तरफ़ है घटिया काम और बहुत बड़ा है और उसकी ताक़त खूब है, और इधर है सही काम और उसकी ताक़त बहुत छोटी है, क्षीण। लेकिन इधर, इस सही काम के पक्ष में कौन है? तुम्हारी इच्छा; मुक्ति की तुम्हारी इच्छा, सत्कर्म की तुम्हारी इच्छा।

