
चाहे आप स्त्री हों या पुरुष, अमीर हों या गरीब, भारतीय हों या अमेरिकी, युवा हों या वृद्ध, हम जीवन के किसी भी पड़ाव पर हों, हमारी मूल इच्छा दुःख से मुक्ति ही है।
आप जिधर भी देखें, हर व्यक्ति अपने सुख की व्यवस्था करने में ही लगा हुआ है। किसी को पैसे में सुख दिखता है, किसी को देह में, किसी को ज्ञान में तो किसी को दूसरों से इज़्ज़त पाने में। हम ये सोचते हैं दुःख से निवृत्ति सुख की तलाश करके मिलेगी लेकिन वहाँ भी हमें निराशा ही हाथ लगती है। सुख और दुःख की सच्चाई न जानना ही हमें इस चक्र में फँसाए रखता है।
श्वेताश्वतर ऋषि से जानिए हमारे दुखों का कारण क्या है और उनसे छुटकारा कैसे पाया जा सकता है। गहराई से समझें कि हमारी सुख की तलाश ही कैसे हमारे दुखों को और बढ़ा देती है।
आचार्य प्रशांत का यह सरल वीडियो कोर्स "दुःख से मुक्ति कैसे हो?" श्वेताश्वतर उपनिषद् के अध्याय 6 के कुछ श्लोकों पर आधारित है। साथ ही श्लोकों से जुड़े कुछ प्रश्नों पर भी चर्चा की गई है।
श्वेताश्वतर उपनिषद् का स्थान ईशादि दस प्रमुख उपनिषदों में है। इसके वक्ता श्वेताश्वतर ऋषि हैं। इस उपनिषद् की विवेचनशैली बड़ी ही सुसम्बद्ध और भावपूर्ण है। यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत है। इसमें कुल छ: अध्याय हैं।
अध्याय 1 में जगत कारण का निर्णय कर प्रण व चिन्तन पूर्वक ध्यानाभ्यास को ही उसके साक्षात्कार का साधन बताया गया है। इसका विशेष विवरण अध्याय 2 में है। अध्याय 2 में ध्यान की विधि व ध्यान के योग्य स्थान, यौगिक क्रियाओं का वर्णन व आत्म साक्षात्कार से सम्बंधित प्रश्नों पर प्रकाश डाला गया है। अध्याय 3 में एक सफल जीवन व उसकी उच्चतम संभावना व अध्याय 4 में मन की स्थिरता पर चर्चा की गयी है। अध्याय 5 और 6 में आंतरिक स्पष्टता के ऊपर ज़ोर दिया गया है।
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