
जितनी ऊर्जा हम दूसरे के दोष ढूँढने में लगाते हैं यदि उसकी आधी ऊर्जा अपने मन को साफ़ करने में लगा दें तो जीवन कुछ अलग ही हो जाएगा। हम ही कुछ अलग हो जाएँगे।
क्या मज़ा है एक डरे-दबे, संकुचित जीवन को जीने में जब एक ऊँचा जीवन संभव है? क्या तरीके हैं वह जिनसे हम ज़िन्दगी में छोटी बातों, छोटे मुद्दों, रोज़मर्रा की नोक-झोंक से ऊपर उठ सकते हैं? बुनियादी तौर पर कैसे अपने ही छुटपन से आगे बढ़ सकते हैं? घर तो साफ़ रख लेते हैं पर मन के जालों को कैसे काट सकते हैं?
ये सभी सवाल यदि आपके भी सवाल हैं तो ये कोर्स आपके लिए बहुत उपयोगी साबित होगा। आचार्य प्रशांत ने इस कोर्स में बहुत ही सरल व स्पष्ट रूप से एक स्वस्थ जीवन के उपयोगी नुस्खे बताए हैं।
आचार्य प्रशांत का यह सरल कोर्स "स्वस्थ मन, मस्त जीवन" श्वेताश्वेतर उपनिषद् के अध्याय 4 के चौदहवें श्लोक पर आधारित है। साथ ही इस श्लोक से जुड़े प्रश्नों पर भी खुलकर चर्चा की गयी है।
श्वेताश्वतर उपनिषद् का स्थान ईशादि दस प्रधान उपनिषदों में है। इसके वक्ता श्वेताश्वतर ऋषि हैं। इस उपनिषद् की विवेचनशैली बड़ी ही सुसम्बद्ध और भावपूर्ण है। यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत है। इसमें कुल छ: अध्याय हैं।
यह पाठ्यक्रम अध्याय 4 के चौदहवें श्लोक पर आधारित है। साथ ही इस श्लोक से जुड़े प्रश्नों पर भी खुलकर चर्चा की गयी है। अध्याय 1 में जगत कारण का निर्णय कर प्रण व चिन्तन पूर्वक ध्यानाभ्यास को ही उसके साक्षात्कार का साधन बताया गया है। इसका विशेष विवरण अध्याय 2 में है। अध्याय 2 में ध्यान की विधि व ध्यान के योग्य स्थान, यौगिक क्रियाओं का वर्णन व आत्म साक्षात्कार से सम्बंधित प्रश्नों पर प्रकाश डाला गया है। अध्याय 3 में एक सफल जीवन व उसकी उच्चतम संभावना व अध्याय 4 में मन की स्थिरता पर चर्चा की गयी है।
आचार्य प्रशांत की इस स्पष्ट व सरल व्याख्या से एक सर्वश्रेष्ठ जीवन के बारे में पता चलता है।
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