
ध्यान को अनवरत होना पड़ेगा, लगातर। ध्यान अगर लगातार है तो बाहर जो भी कर्म होगा, वह कर्म ही ध्यान की विधि बन जाएगा।
ऐसा ध्यान ही श्रेष्ठ है जो लगातार बना रहे, चौबीस घंटे अटूट बना रहे। और जैसे ही उस पर टूटने का संकट आए तो ध्यान स्वयं ही बता दे कि इस संकट का सामना कैसे करना है। संकट का सामना करने के लिए जो कर्म किया जाएगा, वही ध्यान की विधि है।
समझिए ध्यान की वैदिक विधि को आचार्य प्रशांत के साथ - श्वेताश्वतर उपनिषद् के अध्याय 1 पर आधारित इस ऑनलाइन वीडियो कोर्स में।
श्वेताश्वतर उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद का अंग है। इसका स्थान ईशादि दस प्रधान उपनिषदों में हैं। इसके वक्ता श्वेताश्वतर ऋषि हैं। इस उपनिषद् की विवेचनशैली बड़ी ही सुसम्बद्ध और भावपूर्ण है।
यह पाठ्यक्रम श्वेताश्वतर उपनिषद् के प्रथम अध्याय पर आधारित है। इसका आरंभ जगत के कारण के चिंतन से होता है: जगत का कारण क्या है? हम कहाँ से उत्पन्न हुए हैं? किसके द्वारा हम जीवन धारण करते हैं? कौन हमारा आधार है?
इस प्रकार अध्याय 1 में जगत के कारण का चिंतन कर ध्यान के अभ्यास को ही उसके साक्षात्कार का साधन बताया गया है।
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